गुरुवार, १९ नवम्बर २००९

26/11 की कहानी, विदेशियों की ज़ुबानी !

क्या आपने कभी 26/11 के हमले को अंजाम देने वाले आंतकियों में से एकमात्र ज़िंदा आंतकी अजमल आमिर कसाब के बयान की ओरिजनल फुटेज देखी है? भारतीय टीवी चैनल्स पर तो नहीं देखी होगी, क्योंकि भारतीय टीवी चैनल्स को ये मुहैया ही नहीं करवाई गई। इसकी वजह भी साफ है ये संवेदनशील मसला है और इससे जुड़ी हर बात ज़रुरी नहीं की मीडिया से शेयर की जाए। लेकिन जो बात यहां नहीं बताई गई वो विदेशी चैनलों को मालूम है। सुरक्षा कारणों से भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने ताज और ओबेराय के सीसीटीवी की सीमित फुटेज भारतीय मीडिया को मुहैया कराई और कसाब के बयान के बारे में भी मौखिक जानकारियां पत्रकार वार्ताओं के दौरान दी गईं। सैटेलाईट फोन के ज़रिए ये आंतकी अपने आकाओं से किस क़िस्म की बात कर रहे थे इसके बारे में भी बहुत ज़्यादा जानकारियां बाहर नहीं आईं। हमने भी 26/11 पर लगातार कवरेज किया लेकिन इन्हीं सीमित जानकारियों के साथ और ये मानकर भी की ये सुरक्षा का मसला है इससे ज़्यादा जानकारियां दिखाई भी नहीं जानी चाहिए। लेकिन इस हमले के लगभग एक साल गुज़र जाने के बाद भी एक विदेशी चैनल की डाक्यूमैंट्री देखकर मेरे रौंगटे खड़े हो गए। ये फ़िल्म 26/11 को ऑन एयर की जाएगी लेकिन एक दोस्त की मदद से इसकी एक्सक्लूसिव तस्वीरें देखने को मिलीं। मैंने पहली बार कसाब को बोलते हुए सुना और आश्चर्य हुआ ये जानकर कि ये लोग दिमाग़ी तौर पर कितने दीवालिया थे। बल्कि ऐसे ही लोगों को छांटा जाता है जो पहले से दिमाग़ी तौर पर कमज़ोर हों और जिनका ब्रेन वॉश आसानी से किया जा सके। कसाब बार-बार यही कह रहा था कि उन्हे जन्नत जाना था और जिन्होंने उन्हे यहां भेजा है वो खुद भी ये सब कर चुके हैं। मज़हब को बचाने के लिए उन्होंने ये सब किया। यहां पर भेजे जाने का मकसद सिर्फ और सिर्फ लोगों को बेरहमी से मारना था और पूरी दुनिया को दहशत का पैगाम पहुंचाना था। कसाब के साथ पूछताछ के अलावा सैटेलाईट फोन के ज़रिए पाकिस्तान में इन आतंकियों की आख़िरी दम तक चलने वाली पूरी बातचीत भी रौंगटे खड़ी करने वाली है। आतंकी कुबेर बोट को काबू में करने से लेकर दो-दो की टुकड़ियों में पांच जगह रवाना होने तक लगातार अपने आकाओं को अपडेट करते रहे। यहां तक की जिन लोगों को इत्मिनान से मारा गया, यानी अंधाधुंध फायरिंग के अलावा ताज, ट्राइडेंट और नरीमन हॉउस में मारे गए लोगों के बारे में आदेश वहीं से आए। सबसे ज़्यादा सनसनीख़ेज़ वाक्या तब पेश आया जब नरीमन हॉउस में बंधक बनाए गए परिवार को मारने के लिए कहा गया और आतंकी ने थके होने की वजह से कुछ समय की मांग की। थोड़ी देर बात आकाओं का फोन फिर आया उनका मकसद था कसाब को छुड़वाना इसमें कामयाबी नहीं मिलती देख उन्होंने बाकायदा इस दंपती को कैसे मारना है ये तक पाकिस्तान से बैठे बैठे बताया। उन्होंने कहा इनका मुंह दीवार की तरफ करके गोली दागो, फोन ऑन है मैं सुन रहा हूं। गोली चलने की एक आवाज़ आती है, पाकिस्तानी आका कहता है अब दूसरे को मारो और आंतकी कहता है एक से ही दोनों का काम हो गया है। इस तरह की सनसनीख़ेज़ बातचीत इन दस के दस आतंकियों से लगातार होती रही। पाकिस्तान में बैठे आतंकियों के आकाओं ने किस तरह भारतीय चैनल्स पर दिखाई जा रही लाइव तस्वीरों का इस्तेमाल किया इसे भी इस डाक्यूमेंट्री मे दिखाया गया है। खासतौर पर ताज में मौजूद आतंकियों से उनके पाकिस्तानी आका लगातार कह रहे थे सारी दुनिया की नज़र तुम पर है सारे चैनल्स ताज को तवज्जों दे रहे हैं, जब तक आग नहीं लगाओगे बात नहीं बनेगी। अल्कोहल और कालीन का इस्तेमाल करके जितनी बड़ी तादाद में आग लगा सकते हो लगाओ। आग से तस्वीरे और खौफनाक होंगी और दहशत पैदा करेंगी। इन आतंकियों ने ऐसा ही किया भी। नरीमन हॉउस में एनएसजी कमांडोज़ की कार्यवाई का लाइव ब्योरा जो कई भारतीय चैनलों ने दिखाया उसका अपडेट आतंकियों के आका उन्हें देते रहे। चाहे वो हेलिकॉप्टर का हॉउस के ऊपर आना हो या कंमाडोज़ का छत पर उतरना हो। ये आका बार-बार इस बात पर ज़ोर दे रहे थे कि ये आतंकी किसी भी सूरत में ज़िंदा न पकड़े जाए उन्हे ये बता कर भेजा गया था की जन्नत में हूरें उनका इंतज़ार कर रही हैं और मौत ही उनकी ज़िंदगी का मक़सद है। जब इन आंतकियों का हौंसला टूट रहा था तब उनके आका उन्हे बाहर निकलकर गोली बारी करने को कह रहे थे। उनका कहना था ये लोग थका कर तुम्हें ज़िंदा पकड़ना चाहते है लेकिन किसी हालत में तुम इनके हाथ मत आना। कसाब ने भी अपनी पूछताछ में यहीं बताया है कि जुम्मे के दिन तक पूरी दुनिया को दहशत में रखने के बाद मौत ही उनका आख़िरी मक़सद थी। सैटेलाइट फोन पर आखिरी बातचीत ताज में मौजूद फयतुल्ला से हुई वो कह रहा था जनाब मुझे दो गोलियां लगी है, मेरे लिए दुआ करें, मुझे जन्नत मिले, मैंने मजहब के लिए काम किया है, मेरे लिए दुआ करें.......... इस पागल हैवान के आका पूछ रहे थे गोली कहा लगी है.... जिंदा पकड़ में मत आना.... जन्नत ज़रुर मिलेगी। उनका मकसद था इस दहशत को फैलाकर इन लोगों का मर जाना क्योंकि जिस तरह कसाब अंतराष्ट्रीय समुदाय के सामने भारत के पास पाकिस्तान के खिलाफ एक पुख्ता सबूत है उसी तरह अगर एक दो आतंकी और ज़िंदा पकड़ लिए जाते तो इन सबूतों को और मज़बूती मिलती। फयतुल्ला का फोन ऑन रखने के लिए कहकर उसके आका गोलीबारी की आवाज़ों को सुनते रहे और जब उसने जवाब देना बंद कर दिया तब उन्होंने फोन डिसकनेक्ट किया यानि वो मर गया है इस बात की तसल्ली हो जाने के बाद ही उन्होंने सुकून की सांस ली। ये पूरी बातचीत ये भी बताती है की ये दस आतंकी कुछ भी नहीं थे महज़ कठपुतलियां थे और इनकी डोर पाकिस्तान में बैठे इनके आका सैटेलाइट फोन के ज़रिए खींच रहे थे। इन फुटेज और बातचीत को देखकर आतंक से नफरत करने वाले किसी भी शख्स को इस आतंकी हमले के पीछे मास्टर माइंड्स की भूमिका के बारे में और जानकारी मिलती है। साथ ही साथ मज़हब के नाम पर किस तरह युवाओं का ब्रेन वॉश कर उनसे घिनौना काम करवाया जाता है ये भी साफ होता है। ये तस्वीरें ऐसे युवाओं को भी चेताती है जिन पर इन पाकिस्तानी आकाओं की नज़र होती है। ख़ैर ये तो इनकी हक़ीक़त थी लेकिन एक भारतीय मीडियाकर्मी होने के नाते मुझे खेद इस बात का है की इस तरह की कोई बातचीत या फुटेज हमें मुहैया नहीं कराई गईँ। वैसे ये विदेशी चैनलों को भी मुहैया नहीं करवाई गईं थी, लेकिन भारतीय जांच एंजेसियों ने जो फुटेज और बातचीत एफबीआई को मुहैया करवाई वो इन विदेशी चैनलों को अपने सूत्रों से हासिल हो गईं। भारतीय मीडिया को ये क्यों नहीं दी गईं इसका पुख्ता कारण तो मुझे नहीं मालूम, लेकिन भारतीय दर्शक को ये ज़रुर देखने को मिलेगी क्योंकि जिन विदेशी चैनलों पर ये फुटेज आने वाली है उनके दर्शकों की संख्या यहां भी बड़े पैमाने पर है। यानी भारतीय दर्शक तो इन्हे देख पाएंगें लेकिन विदेशियों की ज़ुबानी।

शुक्रवार, २ अक्तूबर २००९

चीन जैसा तामझाम या भारत जैसी आज़ादी?

चीन में साम्यवाद के 60 वर्ष पूरे होने के अवसर पर बेहतरीन आतिशबाज़ी और ज़बरदस्त सामरिक शक्ति का प्रदर्शन ये साफ़ करता है की चीन दुनिया को ये बताना चाहता है कि उस जैसा कोई नहीं। ओलंपिक के दौरान बहुत सी तैयारियां की ही गई थी, कलाकारों की बेहतरीन ट्रैनिंग भी थी और इन्ही तमाम तैयारियों और बची हुई आतिशबाज़ियों का मुज़ाहिरा दुनिया ने दांतों तले उंगली दबाकर देखा भी। चीन ने ओलंपिक के आग़ाज़ से अंजाम तक शानदार पैकेजिंग की और पूरी दुनिया में उसकी वाहवाही भी हुई। चीन बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था दोबारा इन्ही तारीफ़ों को सुनने का और ये मौक़ा भी उसे जल्दी ही मिल गया जब 60वीं वर्षगांठ पर उसने दोबारा सैन्य शक्ति के साथ-साथ इन आतिशबाज़ियों और कलाकारों का इस्तेमाल किया। ज़ाहिर सी बात है ओलंपिक के दौरान ही ये योजना बना ली गई होगी की इस भव्यता और शक्ति प्रदर्शन को दुनिया के सामने एक बार फिर इस ख़ास मौक़े पर रखा जाएगा।

दुनिया में कौन अपनी वाह वाही नही करवाना चाहता, सो चीन ने भी यही किया। दुनिया में कौन ख़ुद को सबसे ज़्यादा ताक़तवर नहीं दिखाना चाहता, यही चीन ने भी दिखाया। लेकिन अहम बात ये है कि क्या दुनिया को इस प्रदर्शन से वाक़ई प्रभावित होना चाहिए? जनाब दुनिया की छोड़ते है क्या हम हिन्दुस्तानियों को ये सोचकर हीनता महसूस करनी चाहिए की हम इस तरह की शक्ति का मुज़ाहिरा नहीं कर पाते है और ये सब हमारा वहीं पड़ोसी कर रहा है जो कभी भारत की सीमा में घुसकर लाल रंग से चीन लिख जाता है, आतंकवाद फैलाने वाले हमारे सबसे बड़े दुश्मन के दोस्त के तौर पर जाना जाता है और इस दहशत गर्दी में उसकी मदद भी करता है, कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानते हुए उसके लिए नई वीज़ा पॉलिसी बनाता है। जी नहीं बिल्कुल भी हीन महसूस करने की ज़रुरत नहीं है क्योंकि ख़ुद को ताक़तवर दिखाने का मतलब, ताक़तवर हो जाना नहीं होता। इसमें कोई दो राय नहीं की बीते वक़्त में चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था के साथ-साथ सामरिक शक्ति को भी बढ़ाया है लेकिन ये भी ग़ौर करने वाली बात है कि भारत समेत अन्य विकासशील देश भी तेज़ी से ख़ुद को मज़बूत कर रहे हैं। लेकिन कोई भी इस तरह की पैकेजिंग के साथ ख़ुद को परोसने की कोशिश नहीं करता जैसी चीन ने की।

ख़ुशियां मनाने में कोई हर्ज़ नहीं है लेकिन जब जश्न का मक़सद भी ताक़त दिखाना हो जाता है तो जश्न, जश्न नहीं रह जाता कोरा प्रदर्शन रह जाता है। चीन दुनिया में अपनी टेक्नोलॉजी और श्रम के साथ-साथ अपनी धोख़ेबाज़ी के लिए भी जाना जाता है। चाहे वो भारत की पी़ठ में हिन्दी चीनी भाई-भाई कहकर छुरा भोंकना हो या अब भी नापाक इरादों वाले पाक को सामरिक मदद के साथ-साथ भारत के साथ कूटनीतिक बातचीत को जारी रखना हो। बहुत मुमकिन है कि इस प्रदर्शन के दौरान भी उसकी कोशिश ताक़त को बढ़ा चढ़ा कर पेश करने की ही रही होगी। कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर वो मिसाईलों की जगह सिर्फ खोखले डिब्बों को तादाद बढ़ाने के लिए रख दे। ख़ैर ये बात मैं सिर्फ़ इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि भारतीय वायुसेनाध्यक्ष के मुताबिक अब हालात 62 वाले नहीं है कि हिन्दुस्तान कमज़ोर पड़ जाए या ऐसे खोखले प्रदर्शनों से घबरा जाए।

ख़ूबसूरती, कलाकारों की मेहनत और अनुशासन की मुक्तकंठ से प्रशंसा की जानी चाहिए और हम करते भी है लेकिन इन सब चीज़ों का इस्तेमाल जब धौंस देने के लिए हो तो प्रशंसा नहीं भर्तस्ना होनी चाहिए। चीन में कोई सेलीब्रेशन नहीं चल रहा था बल्कि ताक़त का मुज़ाहिरा हो रहा था। एक ऐसा मुज़ाहिरा जिससे चीन के आम आदमी का भी कोई लेना देना नहीं था। संगीनों के साए में एक जश्न मनाया जा रहा था जिसमें चीन के आम आदमी को घर से बाहर निकलने तक की इजाज़त नहीं थी। मुझे नज़ारा बहुत ख़ूबसूरत लग रहा था लेकिन हमारी परेड भी याद आ रही थी जो दुनिया को दिखाने के लिए आम हिन्दुस्तानी को दिखाने के लिए होती है और इस आम हिन्दुस्तानी के लिए बैठने का ख़ास इंतज़ाम भी किया जाता है। ऐसे में ये कहना ग़लत नहीं होगा चीन की ताक़त से हिन्दुस्तान की आज़ादी लाख गुना बेहतर है।

मंगलवार, २९ सितम्बर २००९

दुनिया के नंबर1 मुक्केबाज़ का इंटरव्यू

पहले ओलंपिक में ब्रांज़ मैडल, फिर वर्ल्ड चैम्पियनशिप में भी शानदार प्रदर्शन कर मैडल जीतने के बाद अब हिन्दुस्तानी बॉक्सर विजेंन्द्र सिंह ने दुनिया का नंबर 1 बॉक्सर बनने का गौरव भी हासिल कर लिया है। प्वाईंट्स के आधार पर विजेन्द्र 75 किलोग्राम कैटेगरी में अब दुनिया के नंबर एक मुक्केबाज़ बन गए हैं। इस क़ामयाबी के बाद एक शो के दौरान विजेन्द्र से कई दिलचस्प पहलुओं पर बात हुई। उनका सबसे पहला रिएक्शन था ब्रांज़ मैडल सुन-सुनकर वो पक गए है और अब वो गोल्ड मैडल जीतेंगे। विजेन्द्र ख़ुद ये मानते है कि क़िस्मत उन पर मेहरबान है, कड़ी मेहनत को तो वो श्रेय देते हैं लेकिन साथ ही साथ उनका ये भी कहना है कि वक़्त भी अच्छा बुरा होता है। विजेन्द्र ने कहा की देश में कई और भी मुक्केबाज़ है जो शायद मुझसे ज्यादा मेहनत करते होंगे, लेकिन मेरा वक़्त अच्छा आया है तो मैं क़ामयाबी पर क़ामयाबी हासिल करता चला जा रहा हूं। किस्मत को तो वो मानते है लेकिन विजेन्द्र ज्योतिष पर भरोसा नहीं करते हैं। अपने फ़लसफ़े को बताते हुए उनका कहना था जो होना है वो तो होगा ही चाहे अच्छा हो या बुरा। विजेन्द्र ये भी मानते ही क़ामयाबी डर भी बढ़ाती है क्योंकि देश की उम्मीदें आपसे और बढ़ जाती हैं और आपको हर कॉम्पीटीशन में मैडल जीतने के दबाव के साथ खेलना पड़ता है।

विजेन्द्र हिन्दुस्तानी फ़िल्मों के साथ-साथ हॉलीवुड के एक्शन फ़िल्मों के बड़े फैन है। उन्हें आज का वक़्त सपनीला लगता है क्योंकि कुछ सालों पहले तक जिन बड़े बड़े सितारों के पोस्टर उनके कमरे में लगे होते थे, आज उनके साथ मिलकर वो कई बड़े ब्रांड्स को प्रमोट रहे हैं। शाहरुख़ ख़ान के साथ वो दिखे, तो सलमान ने उन्हे दस का दम में, फरहा ने उन्हे तेरे मेरे बीच में बुलाया। उनका कहना था कई बड़े बैनर की फ़िल्म्स के ऑफ़र उन्हे मिले लेकिन उन्होंने फ़िल्मों से दूरी बनाए रखने का फ़ैसला किया है। विजेन्द्र ऐसा एक जाने-माने फिल्म स्टार और अपने फेवरेट हीरों के कहने पर कर रहे है। वो हीरों है ख़ुद खिलाड़ी कुमार के नाम से मशहूर अक्षय कुमार। अक्षय ने विजेन्द्र से कहा है की अभी बहुत लंबा समय बाक़ी है फ़िलहाल खेल पर ध्यान दो फ़िल्में तो मिलती रहेंगी।

आगे विजेन्द्र का कहना था कि सम्मानों का तब तक कोई फ़ायदा नहीं जब तक पूरे देश में बॉक्सिंग को सम्मान की नज़र से न देखा जाए। ऐसा वो इसी लिए कह रहे थे क्योंकि बीजिंग से जीत कर लौटने के बाद उनसे कई वादे किये गए थे जो पूरे नहीं हुए। इन वादों में एक अच्छी बॉक्सिंग ऐकेडमी खोलने का वादा भी था। ये विजेन्द्र का सपना है की वो देश में एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर की बॉक्सिंग ऐकेडमी बनाना चाहते है और देश को बड़ी तादाद में अच्छे बॉक्सर्स देना चाहते है। उनका ये भी कहना है कि क्रिकेट ही देश में खेलों का भगवान है और दूसरे खेल उपेक्षित रह जाते है। बॉक्सिंग की भी हालात बहुत अच्छी नहीं है। ये सच है कि ये बॉक्सिंग का अच्छा दौर है जब बॉक्सर अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं और हम लोगों को सम्मान भी मिल रहा है। लेकिन इन हालात को बनाए रखने के लिए ज़रुरी है बॉक्सर्स को अच्छी सुविधाएं भी मिलें। बातचीत को ख़त्म करते हुए विजेन्द्र ने ये वादा किया कि वो कॉमनवेल्थ में ब्रांज नही बल्कि गोल्ड जीतकर फिर इसी स्टूडियों में दर्शकों से रुबरु होंगे।

First Live Interview with yugratna after her return from UN

http://www.youtube.com/watch?v=wgbDuS2X7aQ

गुरुवार, २४ सितम्बर २००९

‘चालू’ टीवी के बूढ़े ‘सीरियल्स’!

72 सालों तक अमेरिकी टेलीविजन मे छाये रहने वाले सीरियल ‘द गाइडिंग लाइट’ की आख़िरकार विदाई हुई। अमेरिका में 25 जनवरी 1937 को रेडियो पर इसकी शुरुआत हुई थी तब ये 15 मिनट का कार्यक्रम हुआ करता था। शो को काफ़ी लोकप्रियता मिली और 1952 में सीबीएस टीवी पर इसे दिखाना शुरू किया गया। आख़िरकार 2009 में दुनिया में सबसे लंबे चले टीवी सीरियल का सितंबर 2009 में अंत हुआ। गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज इस कार्यक्रम के प्रोड्यूसर्स इसको बंद करने के पीछे रिएलिटी शोज़ की बढ़ती लोकप्रियता को कारण बताते हैं। इस शो के ख़त्म होने पर भारतीय टेलीविजन के इतिहास में लंबे चले कार्यक्रमों पर ख़ास कार्यक्रम करने का मौक़ा मिला। हमारी स्पेशल टीम ने बढ़िया रिसर्च की और लंबे चलने वाले देसी शोज़ की फ़ेहरिस्त तैयार की गई। तय हुआ की जो भी शो सबसे लंबा चला होगा उससे जुड़े किसी बड़े नाम को शो में बतौर मेहमान बुलाया जाएगा। इस रिसर्च में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आये और एक बेहतरीन मेहमान से बातचीत का मौक़ा मिला जो आपके साथ बांट रहा हूं।

सबसे पहले आपके दिमाग़ में सवाल आएगा की भारतीय टेलीविजन के इतिहास में सबसे लंबा चलने वाला सीरियल कौनसा रहा है या अब भी है? कई नाम आपके दिमाग़ में आएंगे ख़ास तौर पर बालाजी टेलीफ़िल्म्स के ज़बरदस्ती खींचे गए और अपने आख़िरी दिनों में जनता की ओर से एकदम ख़ारिज कर दिए गए ‘क’ अक्षर से शुरु होने वाले सीरियल। इनमें पहला नाम ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’, दूसरा नाम ‘कहानी घर-घर की’, तीसरा नाम ‘कसौटी ज़िंदगी की’ और फिर ‘कहीं तो होगा’ आदी के साथ ये फ़ेहरिस्त बहुत लंबी जाएगी। ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ और ‘कहानी घर-घर की’ ने 8 साल तक टेलीविजन पर राज किया और जमकर माल कूटा। ये बालाजी टेलीफ़िल्म्स के सबसे लंबे सीरियल रहे। लेकिन भारतीय टेलीविजन इतिहास के सबसे लंबे सीरियल नहीं। जी हां, कोई और है जो इनसे भी बहुत आगे है!

अब आप इतिहास के झरोखे से ‘शांति’, ‘स्वाभिमान’ या और पहले जाकर ‘हम लोग’ जैसे सीरियल्स की यादें ताज़ा कर रहे होंगे लेकिन ये तो ऊपर लिखे गये सीरियल्स के मुक़ाबले कही नहीं टिकते और शायद यही वजह है कि इनकी यादें और कहानियां अब भी हमारे ज़ेहन में ताज़ा है। लेकिन ‘क’ से शुरू होकर ‘कुख्यात’ हुए बालाजी टेलीफ़िल्म्स के किसी सीरियल की खिचड़ी कहानी आपको याद नहीं होगी। ख़ैर ये बहस का अलग मुद्दा है लेकिन आपके सवाल का जवाब अब भी नहीं मिला की आख़िर सबसे लंबा चलने वाला शो कौनसा है, कहीं रामायण और महाभारत जैसे महान कार्यक्रम तो नहीं ? अरे कहां जनाब रामायण महज़ डेढ़ साल चला, हफ़्ते में एक बार आता था और इसके कुल एपिसोड थे महज़ अठहत्तर। वहीं महाभारत क़रीब दो साल चला और इसके कुल एपिसोड थे चौरानवे। न चैनलों की ये मारामारी थी, न टीआरपी का झंझट, जो कुछ थे यही कार्यक्रम थे। सड़कें ख़ाली हो जाती थी लोग पूजा की थाली और अगरबत्ती लेकर टीवी के सामने बैठ जाते थे। 1987 से 1990 तक का टेलिविजन का ये सुनहरा वक़्त मैंने भी देखा है।

चलिए अब आपको ज़्यादा परेशान नहीं करते हुए बताते है, सबसे लंबे चलने वाले देसी टीवी सीरियल का नाम। आपको जानकार हैरानी होगी की ये कार्यक्रम अब भी बदस्तूर जारी है और दर्शक इसे अब भी पसंद कर रहे हैं। 29 अप्रैल 1997 को सोनी टीवी पर शुरू हुआ ‘सीआईडी’ आज भी चल रहा है और इसने अपने 12 साल पूरे कर लिए हैं जो किसी अन्य सीरियल के मुक़ाबले कही ज़्यादा है। कार्यक्रम की विषय वस्तु और फ़ॉर्मेट कुछ ऐसा है की बालाजी के सीरियल्स की तरह ज़बरदस्ती कहानी को खींचना नहीं पड़ता, हां हर बार कुछ नया और रोमांचक दर्शकों के सामने रखने की चुनौती होती है।

क्या आज का टीवी ‘चालू’ हो गया है और ज़बरदस्ती इस पर कार्यक्रमों को खींचकर दर्शकों को बुद्धू बनाया जाता है? इस विषय पर बात करने के लिए मेरे साथ सीआईडी के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर बी. पी. सिंह ख़ुद मौजूद थे। सिंह साहब के मुताबिक टीवी को चालू टीवी कहने के बजाय इसे आज के प्रतिस्पर्धा के दौर की मजबूरी कहा जाना चाहिए। कोई कार्यक्रम जब चल पड़ता है तो उसे अचानक बंद करना या तय समय सीमा में बांधना मुमकिन नहीं होता, क्योंकि उससे चैनल की टीआरपी और सैंकड़ों लोगों का रोज़गार जुड़ा होता है। हां ये बात सही है की ये मजबूरी ज़्यादातर कार्यक्रमों की गुणवत्ता को बर्बाद करती है और आख़िरकार इन्हे बंद करना पड़ता है। यही वजह है की एक ज़माने में एक छत्र राज करने वाले सास-बहू टीवी सीरियल्स को अब कोई पूछता तक नहीं।

सिंह साहब का आगे कहना था कि साआईडी की लोकप्रियता कि बड़ी वजह हर बार एक नई कहानी को सामने रख पाने की स्वतंत्रता है, क्योंकि ये एक सस्पेंस थ्रिलर है। इन्वेस्टीगेंटिग साईंस में नित नई खोजों की वजह से भी कुछ नया कर पाने मे क़ामयाबी मिलती है। लेकिन कामयाबी की बड़ी वजह मुख्य किरादारों का पिछले 12 सालों से कार्यक्रम के साथ लगातार जुड़े रहना भी है। जबकी हमने देखा जितने भी सीरियल लंबे चले या खिंचे उनमें कभी तुलसी बदली कभी पार्वती। खींचती और उलझती कहानी के साथ ये भी कार्यक्रमों पर से दर्शकों का भरोसा उठने का एक कारण बना। ये बात सही है की जिस वक़्त सास-बहु सीरियल्स की धूम थी ऐसा लगता था अब भारतीय टेलीविजन में कुछ और नहीं चल पाएगा। सिंह साहब ने कहा कि मुझे भी सलाह दी गई की ‘क’ अक्षर का ज़माना है आप भी सीआईडी का नाम बदल कर केआईडी कर दो। लेकिन ‘क’ के टोटके का अंत हुआ जिसने ये बात साफ कर दी कि नाम से सीरियल नहीं चलते बल्कि काम से उनका ये नाम होता है।

आख़िर में मैंने बी पी सिंह साहब से ये सवाल भी किया कि अब ज़माना रिएलिटी शो का है और उसका स्तर कितना गिर चुका है ये भी सबके सामने है लेकिन क्या आपको इनसे कोई चुनौती मिल रही है। उनका जवाब था कि रिएलिटी शो को मिल रही लोकप्रियता तीन साल पहले ही अमेरिका में साबित हो गई थी और उसी की नक़ल हम अब भारत में कर रहे हैं। आप किसी भी रिएलिटी शो को उठा ले वो अमेरिकन टीवी की ही नक़ल है। रिएलिटी शो की लोकप्रियता से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन दर्शकों के साथ ज़्यादती के बाद जो हश्र सास-बहू सीरियल्स का हुआ वो इनका भी हो सकता है।

शनिवार, १९ सितम्बर २००९

संवेदनहीन दिखना एंकर की मजबूरी

कल एक ऐसी घटना हुई जो मेरे पूरे करियर में कभी नही हुई थी। हमारे प्राइम टाइम शो इंडिया प्राइम को करते वक़्त एक ख़बर के दौरान मेरी आंखों में आंसू आ गये। मैं ऑन एयर आंखों में आंसू लिए नहीं जा सकता था इसीलिए दो तीन गहरी सांसे ली और उस रुला देने वाली ख़बर के दौरान अपने कान बंद कर लिए। बाद की ख़बरे और शो के मेहमानों से बात थर्राये हुए गले से ही हुई। पीसीआर के मित्रों ने भी ब्रेक में पूछा, सर आर यू ओके, ब्रेक बढ़वाने की ज़रुरत तो नही? मैंने कहा नहीं सब ठीक है हम आगे बढ़ सकते हैं। लेकिन सब ठीक नहीं था एक मासूम बच्ची की कराहती हुई आवाज़ लगातार मेरे कानों में गूंज रही थी। राजनैतिक ख़बर हो, मनोरंजन की ख़बर हो या खेल की ख़बर वही एक पट्टियों और ज़ख़्मों से भरा ढाई साल की मासूम ज्योति का चेहरा मेरी आंखों के सामने आ रहा था जो बड़ी मासूमियत के साथ कह रही थी मेरी मां ने मुझे ट्रेन से नीचे फेंक दिया।

दरअसल एक मां ने अपनी ढाई साल की मासूम बच्ची को चलती ट्रेन से नीचे फेंक दिया ये ख़बर सुबह से हर चैनल पर चल रही थी। इस ख़बर को मैंने भी देखा था लेकिन बच्ची की बातों को सुनने का मौक़ा अपने शो मे ही मिला। जिस मासूमियत और दर्द के साथ वो बच्ची बोल रही थी उसे मेरे शब्द बयां नही कर पायेंगे। लेकिन उस बच्ची के शब्दों को हर वो शख्स समझ पाएगा जिसने ढाइ साल के बच्चे को तुतलाते हुए बोलते सुना होगा। बच्चे जो भी बोलते है बहुत अच्छा लगता है, लेकिन अगर इसी तुतलाहट के साथ टूटे फूटे शब्दों को जोड़कर कोई बच्ची ये बोले की मुझे मेरी मां ने ही चलती ट्रेन से फेंक दिया और साथ ही साथ ये भी की मुझे मां की याद आ रही है, मुझे मां के पास जाना है तो किसी का भी दिल पसीजेगा। ऑन एयर भी दिल पसीजता है लेकिन उसे बयान करना आप के काम की मर्यादाओं के ख़िलाफ है क्योंकि आप सिर्फ़ यही एक ख़बर दर्शकों को नहीं दिखा रहे हैं कई ओर ख़बरें कतार में है जिनका ‘टेस्ट’ अलग है।

मैं इसके बारे में इसीलिए लिख रहा हूं क्योंकि एक लोकप्रिय एंकर को एक बार मैंने ऑन एयर रोते हुए देखकर टिप्पणी की थी कि एंकर को संवेदनशील होना चाहिए लेकिन शो के दौरान दिखना नही चाहिए। इस घटना के बाद मुझे महसूस हुआ कि संवेदनाओं को दबाना कितना मुश्किल है और संवेदनहीन दिखना एक एंकर की कितनी बड़ी मजबूरी है। ऐसा नहीं कि भावनाएं दुखी करने वाली ख़बरों पर ही आती है, कई बार ज़बरदस्त हंसी को क़ाबू करना भी मुश्किल हो जाता है। इसका अनुभव मुझे और मेरे मित्र सुशांत को साथ में एंकरिंग करते वक़्त तब हुआ था जब प्रमोद मुथालिक को ‘पिंक चड्डियां’ विरोध स्वरूप भेंट की गई थी और इस शब्द को हमें जितनी बार बोलना पड़ा हंसी को रोकने के प्रयास उतने ज़्यादा करने पड़े। मुझे अपना ग़ुस्सा भी याद आता है जो मेरे नाम राशी डॉ प्रवीण तोगड़िया से बात करते हुए मुझे आया था और ऑन एयर मैंने उन्हें संयमित भाषा के प्रयोग और शालीनता बनाए रखने की बात तल्ख़ लहजे मे कही थी। वो घटना भी मैं कभी नहीं भूल सकता जब जनमत में मेरे कार्यक्रम जनता बोले के दौरान जनता के सवालों से घबराए बीजेपी के एक बड़े नेता ‘लैपल’ को तोड़कर मेरी तरफ़ तेज़ी से लपके थे और उसी जनता ने उनके मुंह पर उन्हे एक कमज़ोर नेता कहा था। बाद में ये प्रोग्राम ऑन एयर नही किया गया।
जीवन में ऐसे कई मौक़े आए जब ग़ुस्सा, प्रेम, दुख, ईर्ष्या आदी सभी संवेदनाएं आई लेकिन जब एक एंकर की भूमिका में होता हूं तो संवेदनहीन दिखना मेरी मजबूरी हो जाती है। ये तक़लीफ कुछ वैसी ही है जैसे आप अपने प्रिय मित्रों या परिवार के लोगों पर अपने दुख का असर नही पड़ने देना चाहते हैं और अपने भावों में अपनी संवेदनाओं को छुपाने का प्रयास करते हैं, ये प्रयास एक एंकर को मासूम ज्योति जैसी कई ख़बरों को दिखाते वक़्त करना पड़ता है। जो आंसू मेरी आंखों में थे वो कई दर्शकों की आंखों में भी रहे होंगे वो शायद उन्हें छलका भी पाए होंगे लेकिन मैं सिर्फ़ आंसू की एक बूंद ही ढलका पाया और फौरन दूसरी ख़बरों के लिए ख़ुद को तैयार किया। एंकरिंग आसान काम नहीं है दोस्तों, एंकर संवेदनहीन होता नहीं लेकिन उसे दिखना पड़ता है।