शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

24 दिन 24 बातें- डॉ. प्रवीण तिवारी

हम अपनी आदतों का पुलिंदा हैं। हमारा मन या चित्त चाहे जो कहें वो हमारी इन्हीं आदतों से बना हुआ है। खाने पीने और दिनचर्या की दूसरी आदतों से आगे बढ़ते हुए हमारे डर, आत्मविश्वास, खुशी, दुख और अन्य तमाम भाव भी आदतों से ही जुड़े हुए हैं। ऐसे कई प्रयोग हुए जो बताते हैं कि नई चीजों तो करने में हम हमेशा एक परेशानी महसूस करते हैं और इसकी वजह ये होती है कि हम अपनी आदतों के दायरे को तोड़ना नहीं चाहते हैं। ये भी सच है कि यदि शुरूआती नीरसता के बावजूद किसी अच्छे काम को यदि आदत बनाने के लिए उसे सतत 24 दिनों तक किया जाए तो वो उतना ही सहज हो जाता है जितनी हमारी दूसरी आदतें। इन 24 दिनों में ऐसी कौनसी 24 बातें हैं जिनका अभ्यास हमें सत्य के करीब ले जाता है पर इस पुस्तक में प्रकाश डाला गया है।

cover page of the book published by Mahaveer Publishers Delhi
करत करत अभ्यास के जडमती होत सुजान.. ये बात हम कहते, पढ़ते तो बहुत आए लेकिन हम इसके अपने जीवन में महत्व को कितना समझते हैं। एक छोटे से उदाहरण से इस बात को समझा जा सकता है कि यदि आपको किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में गाने, नाचने या बोलने के लिए कहा जाता है तो आप के हाथ पैर फूल सकते हैं। ऐसा तभी होता है जब आप इन विधाओं में महारत नहीं रखते हों। इसके उलट यदि किसी ने गाने, नाचने या बोलने का अभ्यास किया है या वो इन्हें अभ्यास के तौर पर अपने जीवन में आजमाता है तो वो खुशी खुशी ऐसे मौकों पर अपनी इस कला का मुजाअरा करता है। अलग अलग हुनर के मामले में तो ये बात हम सब समझते हैं लेकिन जीवन जीने की कला, विभिन्न परिस्थितियों पर हमारी प्रतिक्रिया, लक्ष्य के लिए आगे बढ़ते हुए पेश आने वाली चुनौतियों जैसी बहुत सी बातों में हम इस सामान्य से विज्ञान को भूल जाते हैं। आप जिस अभ्यास में माहिर हो जाते हैं उसमें आत्मविश्वास से लबरेज भी होते जाते हैं। सत्य को पाने और जीवन को सही तरीके से जीने पर भी यही बात लागू होती है।

यूं तो बहुत कुछ बहुत से ज्ञानियों ने पहले ही लिख दिया है लेकिन फिर भी उन्हें जीवन में उतारने का अभ्यास हम नहीं कर पाए हैं। विचारों की कौंध में जीते हुए हम ठीक से देखना, सुनना, लिखना और बोलना तक भूल गए हैं। ये किताब पहले तो आपको स्वविवेक से इस बात को समझने में मदद करती है कि क्या हम सोए हुए हैं। क्या सचमुच हम दिन प्रतिदिन अपने जीवन के साथ सही अभ्यास कर रहे हैं? क्या हम सही आदतों को अपने जीवन में जगह दे रहे हैं? उन्हें पहचानना और यदि वो सही नहीं हैं तो उनके विपरीत सही अभ्यास को जीवन का हिस्सा बनाना इस पुस्तक का मकसद है। ऐसे ही 24 महत्वपूर्ण अभ्यासों पर ये पुस्तक रौशनी डालती हैं। जिनमें सतत अभ्यास का अभ्यास और अनुभव का अभ्यास भी शामिल है। इन अभ्यासों को जीवन का हिस्सा बनाने से आप सत्य की ओर अग्रसर होते हैं और एक अच्छे व्यक्तित्व के मालिक भी बनते हैं। अच्छा व्यक्तित्व और सत्य की जीवन में क्या आवश्यकता है पर भी ये पुस्तक रौशनी डालती है।


online availability 
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शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

विलेन की फिल्म के अंत में जमकर धुनाई करने वाला होता है कार्टूनिस्ट-सुधीर तैलंग को श्रद्धांजलि

हिंदी फिल्मों में विलेन शुरुआत से लेकर अंत हीरो और उसके परिवार पर अत्याचार करता रहता है। आखिरी कुछ मिनिटों में वो वक्त आता है जब हीरो विलेन का अंत करने वाला होता है। इस सीन के आने से पहले दर्शक में भी हीरो की बहन, मां-बाप, दोस्तों आदि पर किए गए अत्याचारों का गुस्सा भर जाता है। अंत में जब हीरो उस विलेन की पिटाई कर रहा होता है तो दर्शक के मन में भी यही भाव आता है कि कुचल कर रख दो इस जालिम को। बड़ा परेशान किया है इसने और विलेन के अंत के बाद दर्शक एक सुकून महसूस करता है। यहीं हाल सिस्टम से पिटे आम आदमी का होता है। सुबह जब वो अखबार में स्कैम, अपराध और अन्य नकारात्मक खबरों को देखता है तो उसका गुस्सा ऊबाल पर होता है। ऐसे में एक कार्टूनिस्ट का राजनेताओं और सिस्टम पर करारा प्रहार उसे वही सुकून देता है जो विलेन की हीरो द्वार पिटाई के बाद दर्शकों को मिलता है। मेरे साथ ही साल 2002 में एक इंटरव्यू के दौरान ये बात तैलंग साहब ने कही थी। इससे अच्छी और सरल पॉलिटिकल कार्टूनिंग की परिभाषा कोई दूसरी नहीं हो सकती। इस बात को कहने वाला किस जिम्मेदारी के साथ अपने कार्टून्स को बनाता था उसका अंदाजा भी आप लगा सकते हैं। 
launch of his sudhir tailang's book India on Sale
वो सचमुच वो हीरो थे जो आम आदमी के गुस्से को बाहर निकालने का मौका देते थे। इस पीएचडी के साथ ही उन्हें निजी तौर पर जानने का सौभाग्य मिला और फिर कई बार उनसे मुलाकातें होती रही। पिछले 13 सालों के साथ ने उनके साथ एक गुरू एक गाइड का संबंध जोड़ दिया था। जो अंत तक जारी रहा। उनके कैंसर से लड़ने के दौर में उनसे कम बात हुई। लेकिन जब वो अस्पताल से घर वापस आए और उन्होंने बताया कि सब ठीक है तो लगा था वो कैंसर की लड़ाई जीत लेंगे लेकिन उनके यूं अचानक चले जाने से कार्टूनिंग जगत के साथ साथ मुझे एक निजी क्षति हुई है।
सुधीर तैलंग और आर. के. लक्ष्मण में एक बड़ी समानता ये थी कि दोनों ही सिर्फ कार्टून बनाने के लिए बने थे। शंकर, अबु, मारियो, रंगा जैसे कई कार्टूनिस्टों की परंपरा को आगे बढ़ाने वालों में सुधीर तैलंग सबसे कारगर साबित हुए। पोलिटिकल कार्टूनिंग सचमुच खत्म होती जा रही है अब अखबारों में वो कार्टून और कार्टूनिस्ट नहीं मिलते जो पहले हुआ करते थे। सुधीर तैलंग इस बात को खुद भी मानते थे। मेरे लिए उनका जाना एक निजी क्षति है। कार्टून बनाने के शौक ने बहुत छोटी उम्र में अखबारों में छपने वाले कार्टून्स की कॉपी करने का अभ्यास पैदा कर दिया था। उसमें भी हिंदुस्तान टाइम्स में छपने वाले HERE & NOW कॉपी करना बहुत अच्छा लगता था। उस समय कार्टून का विषय वस्तु तो समझना नहीं आता था। उसकी लाइन्स और ड्रॉईंग को देखना और कॉपी करना अच्छा लगता था। पत्रकारिता की पढ़ाई करते हुए पहली बार मौका मिला आर. के. लक्ष्मण के साथ एक वर्कशॉप करने का। इसी वर्कशॉप में पहली बार सुधीर तैलंग जी से भी मिला। जब मैंने जाना कि ये वहीं सुधीर तैलंग हैं जिनके कार्टून मैं कॉपी किया करता था। पहली बार किसी सेलीब्रिटी से मिलने वाला एहसास हुआ। यही है वो शख्स जिनके कार्टून हम बहुत छोटी उम्र से देखते आ रहे हैं।
इसी वर्कशॉप में कार्टून के मास कम्यूनिकेशन का अहम हिस्सा होने की बात समझ आई थी। कितने प्रभावी तरीके से ये कार्टून पत्रकार अपना काम कर रहे हैं । इसी विषय पर पीएचडी करने का इच्छा थी। पर कैसे करें, क्यूंकि कोई लिटरेचर मौजूद नहीं, कुछ लिखा नहीं गया? ये सवाल मन में उठे। तरीका एक ही था उनसे जानों जो इस फील्ड के महारथी हैं। इस वर्कशॉप के लगभग दो साल बाद दिल्ली में हिंदुस्तान टाइम्स की बिल्डिंग में पहली बार सुधीर जी से मिलने का मौका मिला। राजेंद्र धोड़पकर जी का नंबर मिला था। उनसे बात हुई और उन्हीं ने फिर सुधीर जी का कमरा दिखाया। सुधीर जी से मिला तो वही सेलीब्रिटी से मिलने वाली फीलिंग थी। बहुत लंबी बात हुई। मैं और पंकज ये पूरा इंटरव्यू रिकॉर्ड करते रहे। ऐसा लगा पूरी किताब उनके जीवन में बसी हुई है। तभी तय किया कि इस पूरी रिसर्च में सर का मार्गदर्शन ही लिया जाएगा। अपनी इच्छा उनके सामने रखी और वो बहुत खुश हुए। वो पूरी रिसर्च के दौरान अपना मार्गदर्शन देते रहे और इसके पुस्तक में आने का इंतजार करते रहे। ये मेरे लिए बहुत दुखद है कि अब जब इस पुस्तक पर काम शुरू हुआ है तो हमारे बीच नहीं हैं जिन्होंने इसकी प्रस्तावना लिखी।
Sudhir Tailang, Sudhir Chaudhary and me after a show on Live India

उनकी किताब इंडिया फॉर सेल पर हाल में एक पूरा कार्यक्रम बनाया था। वो बहुत खुश थे और ऐसा लग रहा था कि अभी कई किताबें हमें देखने को मिलेंगी। हाल ही में आर. के. लक्ष्मण और उनके बाद सुधीर जी के जाने से कार्टूनिंग जगत को कभी न पूरी होने वाली कमी झेलनी होगी। 2004 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। कार्टूनिस्ट को ये पहचान मिलना बहुत बड़ी कामयाबी मानी जाती है। कार्टूनिस्ट के निशाने पर हर कोई होता है खासतौर पर सत्ताधारी दल। फिर भी उनके कार्टूनों ने उन्हें सभी का दोस्त बनाया। आडवाणी जी और नरसिंहराव उनके प्रिय किरदार रहे जिनके कैरीकेचर बनाने में उन्हें सबसे ज्यादा आनंद आता था। कार्टूनिंग पर की गई रिसर्च में उनके योगदान और विचारों को जल्द आपके साथ साझा करूंगा। मेरी सुधीर सर को श्रद्धांजलि।

मंगलवार, 15 सितंबर 2015

कुछ सवाल जिनके जवाब जरूरी हैं। डॉ. प्रवीण तिवारी, एंकर IBN 7


मेरे ही शो के दौरान एक ऐसी निंदनीय घटना हुई जो घोर भर्त्सना के काबिल है। इस घटना की मैं और हमारा चैनल दोनों ही निंदा कर रहे हैं। निंदा करते हैं तो दिखा क्यूं रहे हैं? ऐसे लोगों को बुलाते ही क्यूं हैं? आप एंकर हैं आपने रोकने की कोशिश क्यूं नहीं की? आप ही भड़काते हैं और फिर टीआरपी बटोरते हैं? टेलीविजन के कई मर्मज्ञों ने इस प्रकार के सैंकड़ों प्रश्न ट्वीटर, फेसबुक, वाट्सएप और मेल के जरिए मुझे निजी तौर पर भेजे हैं। जो स्नेहीजन हैं वे इस घटना के बाद मेरे लिए चिंतित भी थे। आप सभी सुधीजनों और स्नेहीजनों को सादर नमन करते हुए कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर दे रहा हूं। ये मेरी नितांत निजी राय हैं। ये मेरे संस्थान की खूबसूरती और बड़प्पन है कि वो मुझे अपनी बात लिखने और कहने देने की स्वतंत्रता देता है। मैं अपने संस्थान का भी आभार व्यक्त करते हुए अपनी बात शुरू कर रहा हूं। अलग अलग सबके प्रश्नों का जवाब देना संभव नहीं था। ज्यादातर प्रश्न एक जैसी ही हैं। कुछ छात्रों और युवाओं ने उत्तेजनावश कई अप्रासंगिक प्रश्न भी भेजे लेकिन वे टेलीविजन पत्रकारिता से अभी अनभिज्ञ हैं उनके प्रश्नों के जवाब में भी कुछ बातें । कार्टून मेर प्रिय विषय है मुझ पर भी कार्टून बनें ये अत्यंत गर्व का विषय है। वो भी मेरे प्रिय कार्टूनिस्टों शेखर गुरेरा और कीर्तीश जी के हाथों। इन दो कार्टूनों को भी शामिल कर रहा हूं जो हजार शब्दों के बराबर हैं।
आप शो के एंकर थे आपने बीच बचाव की कोशिश क्यूं नहीं की?
साभार बीबीसी हिंदी कीर्तीश
मैं अपने चैनल पर लगातार पिछले दो दिनों से इस विषय पर अपनी बात कहता रहा हूं। कुछ रेडियो चैनल्स और अखबार भी इस विषय पर मेरी सफाई मांग चुके हैं और मैंने उनके साथ पूरी तरह से सहयोग किया है। यहां आप मित्रों को एक बार इस घटना के दौरान उपस्थित हुई स्थिती से अवगत करना चाहूंगा। मैं लगातार मेहमानों को गरिमामयी तरीके से बात करने के लिए कहता रहा। अप्रिय स्थिती बनने की स्थिती में मैंने उन्हें चुप रहने के लिए आग्रह भी किया। जब दीपा शर्मा अपनी कुर्सी से उठीं तो मुझे लगा कि वे शो छोड़कर जा रही हैं। ऐसी स्थितियां कई बार बनती है जब अनर्गल बातों से नाराज मेहमान शो छोड़कर चला जाता है। ओम बाबा कुछ ऐसी ही निजी बातें उनके बारे में कह रहे थे। लेकिन कुर्सी से उठने से महज 15 से 20 सैकेंड के बीच में वो ओम बाबा के नजदीक पहुंची और चांटा रसीद कर दिया। इसके फौरन बाद बाबा ने उन्हें चांटा मारा। एस्टोलॉजर राखी भी वहां मौजूद थीं। मैं फौरन ही इस जगह पर पहुंच गया था और इन दोनों को अलग करने का प्राथमिक प्रयास मैंने और राखी ने किया। इसके बाद न्यूज रूम से तमाम सीनियर्स भी यहां पहुंचे और हमने इन दोनों को अलग किया। ओम बाबा के महिला पर हाथ उठाने की कड़ी भर्त्सना करते हुए हमने उन्हें वहां से फौरन जाने के लिए कहा।
आप ऐसे लोगों को बुलाते ही क्यूं हैं?
दीपा शर्मा शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी की प्रवक्ता रह चुकी हैं। ओम बाबा हिंदू महासभा ओम के पदाधिकारी हैं। दोनों ही कई चैनलों पर लंबे समय से पैनलिस्ट के तौर पर बैठते रहे हैं। ये दोनों हमारे शो आज का मुद्दा में भी कई बार आमने सामने आए हैं। ऐसे किसी भी मेहमान से ये आशंका नहीं रहती कि वो ऑन एयर इतना असंयमी हो सकता है कि हाथापाई पर उतर आए। ये भी आशंका कम ही रहती है कि वो किसी के निजी जीवन के बारे में अभद्र टिप्पणियां करने लगेगा। जैसे ही ये स्थिती बनी मैंने इन दोनों को ही धन्यवाद कर शो से बाहर करने का फैसला कर लिया था लेकिन जब तक मैं इसकी घोषणा करता महज कुछ सैकेंड्स में वो हो गया जो घोर निंदा के काबिल है।
साभार शेखर गुरेरा
ऐसे विषय क्यूं उठाते हैं?
राधे मां पर बात करने की जरूरत ही क्या है? मैं इस प्रश्न का उत्तर बहुत ईमानदारी से देना चाहता हूं। आईबीएन 7 पर उसी दिन कई और मुद्दों और मसलों पर चिंतन हुआ। क्या आपको वो याद हैं? चैनल के कार्यक्रम शाबाश इंडिया में देश के युवाओं के टैलेंट को दिखाया जाता है दर्शक इसे पसंद करते हैं। हम तो पूछेंगे में सुमित अवस्थी प्राइम टाइम की सबसे बेहतरीन चर्चा सबसे गंभीर विषयों के साथ लेकर आते हैं। खुशी की बात ये है कि आप इन कार्यक्रमों को देखते भी हैं और पसंद भी करते हैं। लेकिन जरा गंभीरता से विचार कीजिए इन्हें ट्वीटर पर या फेस बुक पर नंबर वन ट्रैंडिंग टॉपिक बनाने का प्रयास क्यूं नहीं करते? आपने कोई सवाल मुझसे किसी अन्य कार्यक्रम के बारे में क्यूं नहीं पूछा? जहां तक राधे मां के टॉपिक का प्रश्न है मैं जनता की आस्था से खिलवाड़ करने वाले, उन्हें गुमराह करने वाले किसी भी विषय के खुलासे को महत्वपूर्ण विषय मानता हूं। आप सिर्फ टॉपिक पर न जाए उस दौरान क्या चर्चा चल रही थी। किन बातों के प्रति दर्शकों और आम लोगों को जागरूक किया जा रहा था उसे भी समझने का प्रयास करें। लोगों के गाढ़े पसीने की कमाई शो बिज में उड़ाना और आध्यात्मक का मजाक उड़ाने वालों का खुलास में अगंभीर विषय नहीं मानता। दर्शक भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि वे इस विषय को देखना सुनना चाहते हैं।
निंदा करते हैं तो दिखाते क्यूं हैं?
ये प्रश्न वही पूछ रहे हैं जो सतत इसे देख रहे हैं। या वे लोग भी पूछ रहे हैं जो.... आप इतना क्यूं देखे जा रहे हैं... से परेशान हैं। मैं सिर्फ एक टेलीविजन पत्रकार ही नहीं हूं एक अध्यापक भी हूं। मेरे विद्यार्थी मुझ पर पूरा भरोसा करते हैं और मैं भी उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी समझता हूं। ताइवान में ऑनएअर मारपीट की तस्वीरें हमारे चैनलों ने चलाई। मेरे शो के दौरान हुई हाथापाई की तस्वीरें तमाम अन्य चैनलों ने भी चलाई। क्यूं? ये पत्रकारिता के विद्यार्थी हैं या रहे हैं या व्यवसायिक रूप से टेलीविजन पत्रकारिता को जानते हैं वो जानते हैं कि ये एक अहम और बड़ी खबर है। किसी राष्ट्रीय न्यूज चैनल के स्टूडियो में इस तरह की हाथा पाई बड़ी खबर है और इसीलिए इसे हम ही नहीं पूरा देश दिखा रहा है। क्यूंकि हमारे चैनल में हुआ, मैं एंकर था तो हमारी जिम्मेदारी इस विषय पर ज्यादा जानकारी देने की बनती है। उस जिम्मेदारी को निभाना जरूरी है। ऐसा नहीं कि कोई अन्य खबर चली ही नहीं. सारे शोज और बुलेटिन वैसे ही चलते रहे लेकिन आपकी नजर में सिर्फ ये खबर ज्यादा क्यूं आ रही है इस पर आपको विचार करना चाहिए? इस पर विचार करते ही आपको टेलीविजन में इन तस्वीरों और इस खबर का महत्व खुद ब खुद समझ में आ जाएगा।
क्या कदम आगे उठाएंगे?
कुछ लोगों ने ये सवाल भी पूछा है कि आगे आप इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए क्या करेंगे? ये चिंतन का गंभीर विषय है। कोई मेहमान किस मनःस्थिती में बैठा है कहना मुश्किल हैं लेकिन ये तो जरूर किया ही जा सकता है कि किसी भी मेहमान के बैकग्राउंड को पहले ही पता किया जाए। इस घटना में शामिल दोनों ही मेहमानों के बारे में पहले ही लिख चुका हूं कि वे टेलीविजन के लिए नए नहीं हैं और लोग उन्हें जानते थे। कल हमारे ही शो में महामंडलेश्वर मार्तंडपुरी जी और आचार्य दीपांकर जी महाराज ने कहा कि व्यक्तित्व और व्यक्तिगत गुणों के आकलन के साथ साथ उनके उस विषय पर किए गए कार्यों की विवेचना करने की जरूरत है जिस पर वो बोलने आए हैं। साथ ही विषयों में किसी भी मेहमान के पटरी से उतरते ही उसे चर्चा से बाहर करने और दोबारा न बुलाने का प्रावधान भी होना चाहिए।

टेलीविजन हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हम बहस को बहस इसीलिए कहते हैं क्यूंकि उसमें दो विपरीत सोच के मेहमान अपनी बातों को तर्कपूर्ण तरीके से रखते हैं। दोनों ही पहलुओं को सुनकर दर्शक अपनी राय भी बनाते हैं। ऐसी चर्चाओं के महत्व को शास्त्रार्थ की परंपरा से भी तौला जा सकता है। हां शास्त्रों के मर्मज्ञ और सतही ज्ञानियों के फर्क के लिए एक मजबूत व्यवस्था बनानी होगी। इसमें आप भी सहयोग देवें। मैंने ज्यादातर महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर पूरी ईमानदारी से यहां देने के प्रयास किए हैं इसके बावजूद यदि आप सार्थक चर्चा करना चाहते हैं तो मुझे drpraveentiwari@gmail.com पर मेल करें। @drprveentiwari  ट्वीटर हैंडल का उपयोग करें या मेरे फेसबुक प्रोफाइल drpraveen tiwari का उपयोग करें। स्नेह बनाएं रखें। धन्यवाद।

शनिवार, 12 सितंबर 2015

मोदी के मददगार नहीं हैं ओवैसी!


जैसे ही लालू नीतीश और कांग्रेस साथ आए ये तय हो गया कि बिहार का मुस्लिम मतदाता अब पूरी तरह से इसी महागठबंधऩ के साथ खड़ा होगा। गठबंधनों की राजनीति के बीच बिहार की सियासत को हिला कर रख दिया एमआईएम प्रमुख असदूद्दीन ओवैसी ने। जेडीयू, कांग्रेस, राजद महागठबंधन को वोट देना मुस्लिम मतदाताओं मजबूरी लग रही थी क्यूंकि उनके बारे में ये माना जा रहा है कि वे बीजेपी को विकल्प के तौर पर नहीं चुनेंगे। जबकि बीजेपी का दावा है कि अब बिहार की जनता विकास के मुद्दे पर आगे बढ़ रही है। कितनी जागरूकता इस लिहाज से बिहार के मतदाताओं में आई ये कहना तो मुश्किल है लेकिन एक बात तय है कि ओवैसी के मैदान में आने से समीकरण बदल सकते हैं। ओवैसी ने क्यूं ये कदम उठाया ये भी वो साफ नहीं बता रहे हैं लेकिन जानकार कहते हैं कि इसे बीजेपी के फायदे के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। जिस सीमांचल में ओवैसी चुनाव लड़ रहे हैं वहां बीजेपी के पिछले प्रदर्शन को देखना भी जरूरी है।

सीमांचल का बड़ा हिस्सा मुस्लिम बहुल है। किसनगंज में तो मुसलमानों की आबादी 70 फीसदी है। वहीं अररिया, कटिहार और पूर्णिया में मुसलमान लगभग 40 फीसदी हैं। सीमांचल के पूरे क्षेत्र में कुल 24 सीटें आती हैं। ओवैसी कितनी सीटों पर लड़ेंगे ये तो उन्होंने नहीं बताया लेकिन यही वो इलाका है जहां उन्होंने अपनी जमीन दिखाई दे रही है।

2009 लोकसभा चुनाव में अररिया, कटिहार और पूर्णिया इन तीन सीटों को बीजेपी ने जीता था जबकि किसनगंज कांग्रेस के खाते में गई थी। वहीं हाल में हुए लोकसभा में चुनाव में 40 में से 32 सीटें जीतने वाली बीजेपी ने सीमांचल की चारों सीटों में से एक पर भी जीत हासिल नहीं की। कांग्रेस, एनसीपी, आरजेडी और जेडीयू चारों को एक एक सीट मिली। इन सबका एक साथ आना इस वोट को और मजबूत करने की कोशिश है। यदि इन हालात में ओवैसे यहां पर ताल ठोकते हैं तो वो मोदी को फायदा नहीं पहुंचा रहे हैं बल्कि सीमांचल के वोटर्स को एक विकल्प दे रहे हैं।

पिछले विधानसभा चुनाव की बात करें तो 2009 के लोकसभा चुनाव का असर 2010 के विधानसभा चुनाव में दिखा था। बीजेपी ने सीमांचल की 24 विधानसभा सीटों में से 13 सीटें जीती थीं। लोजपा को 2, कांग्रेस को 3, राजद को 1, जदयू को 4 और 1 अन्य को मिली थी। 2014 के लोकसभा के चुनाव में बीजेपी को सीमांचल में झटका लगा है और हो सकता है इसका असर विधानसभा चुनाव में भी दिखाई पड़े। मुस्लिम मतदाता जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस की अवसरवादिता पर कोई विकल्प तलाश लें कि उम्मीद ओवैसी को है। 

रविवार, 6 सितंबर 2015

अपने बच्चों के कत्ल की क्या है वजह?

आरूषी हत्याकांड के बाद सबसे सनसनीखेज हत्याकांड शीना वोरा का रहा। इन दोनों ही मामलों में सबसे ज्यादा चौंकाने वाला सामान्य पहलू है माता-पिता का ही हत्या में हाथ होना। खबरों के लिहाज से ये तथ्य आम पाठकों के मनोभाव को बुरी तरह से झकझोर देता है कि कैसे मां बाप ही अपने बच्चों का कत्ल कर सकते हैं। इन दोनों ही मामलों में और ऐसे ही ज्यादातर मामलों में सामाजिक सम्मान एक ऐसा पहलू है जो ऐसे जघन्य अपराध की जड़ में दिखता है। हांलाकि शीना के मामले में आर्थिक पहलुओं को भी खंगाला गया है। फिर भी जो कहानी अभी तक सामने आई है उसके मुताबिक इंद्राणी के तीसरे पति के छोटे बेटे राहुल और शीना के प्रेम संबंधों से ये परिवार परेशान था। बेशक इनका आपस में कोई लेना देना नहीं था लेकिन सामाजिक रूप से वे सौतेले भाई बहन तो थे ही। आरूषि के मामले में उसके भी भटक जाने की वजह सामने आई। नौकर से उसके संबंध जैसी खबरें भी आपने पढ़ी और सुनी। इन जैसे मामलों को जब आप सुनते देखते या पढ़ते हैं तो रिश्तों की उलझन और समाज की नजरों के बारे में एक अलग दुनिया को अपने सामने पाते हैं।
इंद्राणी अपने जीवन में कई ऐसे काम करती रहीं जो शायद ही समाज पचा पाए। उनके मामले में भी ये उनका निजी मामला था लेकिन जब इंद्राणी ने समाज का सम्मान हासिल कर लिया तो वो अपनी बेटी के मामले में ये सब पचा नहीं पाईं। यही बात तलवार दंपत्ति के मामले भी सामने आई। उनका अपना निजी जीवन समाज के सामने जैसा था क्या उतना ही साफ सुथरा समाज की नजरों से छुपकर भी था? इंद्राणी और पीटर का वर्तमान जीवन चमक दमक वाला है लेकिन क्या समाज की नैतिकता के दायरे में उतनी ही चमक उनके असली जीवन में थी? इन दोनों ही परिवारों के बच्चे सही थे या नहीं ये तो एक अलग विषय है लेकिन क्या इस बात में किसी को भी संदेह हो सकता है कि उनके संस्कारों और जीवन के भटकाव के लिए उनके अपने ही मां बाप जिम्मेदार थे। ये विषय इसीलिए महत्वपूर्ण है क्यूंकि अपनी गलती से उपजे बच्चों के भटकाव के लिए इन बच्चों को सजा देना कैसे न्याय संगत हो सकता है?
दो महत्वपूर्ण पहलू हमारे सामने आते हैं। एक सामाजिक सम्मान-प्रतिष्ठा-पहचान और दूसरा परिवार और रिश्तों का ताना बाना। सिर्फ ऐसे ही मामलों पर नजर न दौड़ाएं जहा कोई जघन्य अपराधिक घटना हो गई है। आमजीवन में परिवारों और सामाजिक सोच पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। सामाजिक प्रतिष्ठा क्या है?  इस प्रश्न पर विचार करते हुए सबसे सामान्य उत्तर आप यही पाएंगे कि जिस समाज में हम रह रहे हैं वहां हमारे रहन-सहन, आचार-विचार और व्यवहार के बारे में अन्य लोगों की क्या राय है? हम दूसरों की नजरों में अच्छा दिखना और रहना चाहते हैं लेकिन हम सचमुच अच्छे दिखने और अच्छे होने पर कोई विचार ही नहीं कर रहे हैं। दूसरों की नजरों में खुद को बेहतर दिखाने की कोशिश ही आपके व्यक्तित्व में कई झूठ ले आती है। आप जैसे हैं उससे बेहतर खुद को दिखाने की कोशिश करते हैं और समाज भी आप जैसे हैं उससे बेहतर ही आपको देखता है। होने और दिखने के इस झूठ में पिसते हैं वो लोग जो किसी की जिंदगी का एक किरदार भर होते हैं। आरूषी और शीना जैसे बच्चे ऐसे ही नाम हैं जो अपने मां बाप की समाज में दिखने वाली झूठी प्रतिष्ठा में एक किरदार भर होते हैं। दूसरा महत्वपूर्ण पहलू रिश्तों की उलझन है जो परिवार के सदस्यों की परिवार में भूमिका से बनता है।
इस उलझन पर दो तरीकों से विचार किया जा सकता है। एक फिलॉसफिकल तरीके से दूसरा व्यवहारिक तरीके से। आध्यात्मिक या फिलॉसफिकल चिंतन तो सीधी बात कहेगा कि अपेक्षाओं और मोह के बंधनों से ये रिश्ते भ्रष्ट होते चले जाते हैं। यदि सभी चिंतन के इस स्तर को पा लें (जो कि उन्हे पाना चाहिए) तब तो इस तरह कि कहानियां सामने आएंगी ही नहीं। सभी अपनी स्वतंत्रता की तरह परिवार के अन्य सदस्यों की स्वतंत्रता पर विचार करने लगें तो रिश्तों में उलझन आने का प्रश्न ही नहीं उठता। माता पिता अपने बच्चों के हितों के अनुरूप उनका सहयोग करें, समय दें, शिक्षा दें तो उनके भटकाव की आशंका कम होती है। हम सब जानते हैं कि लोग गलतियां करके ही सीखते हैं लेकिन जब अपने बच्चे गलती करते हैं तो उसे सहजता से नहीं लिया जाता। हम सब चाहतों का एक बड़ा पुलिंदा अपने बच्चों के सिर पर डाल कर रखते हैं। हम चाहते हैं कि वे सामाजिक प्रतिष्ठा को और चमकदार बनाने में महत्वपूर्ण किरदार निभाएं। यदि वे इसके उलट करते हैं तो उनसे अपेक्षाओं के बजाए नफरत होने लगती है। ये नफरत आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा और उस पर होने वाले नुकसान से सीधे अनुपात में हो जाती है। ज्यादा प्रतिष्ठित लोगों को अपने बच्चों की गलतियां ज्यादा नगवार गुजरती हैं क्यूंकि वे बच्चे उनकी कहानी में सही किरदार की तरह फिट नहीं बैठ पाते हैं।
अब व्यवहारिक दृष्टिकोण से इस परेशानी पर विचार करना चाहिए। कितने माता पिता हैं जो अपने बच्चें के विकास के दौरान ईमानदारी से अपना किरदार निभाते हैं? जिस तरह ये बच्चे उनकी जिंदगी और प्रतिष्ठा की कहानी में एक रोल अदा करते हैं उसी तरह इन बच्चों की अपनी जिंदगी में भी तो माता-पिता का अहम किरदार होता है। माता पिता बच्चों से तो उनके सम्मान की रक्षा की अपेक्षा रखते हैं लेकिन वे अपने बच्चों के मनोभावों को कितना समझ पाते हैं? बच्चों की अपेक्षाओं का कितना ज्ञान उन्हें हो पाता है ये हम सबके लिए एक विचारणीय बिंदु है। शीना अपनी डायरी में जो कुछ लिखती रही या आरूषि अपनी जिंदगी में जो कुछ लिखती रही, उसकी खबर रखने से ज्यादा दिक्कत उन बातों के दुष्परिणाम सामने से होती दिखती है। यही वजह है कि जब बातें हाथ से निकल जाती हैं तो माता पिता इसकी लीपोपोती के आसान रास्ते ढूंढते हैं। कुछ इतने परेशान हो जाते हैं कि वो शीना और आरूषि जैसी कहानियां रच डालते हैं।
माता पिता को बच्चों की जितनी जरूरत है उतनी ही या उससे कहीं ज्यादा जरूरत बच्चों को अपने माता पिता की भी है। बच्चे आज की झूठी प्रतिष्ठा की दौड़ में माता पिता के लिए अपनी फिल्म के किरदार बन कर रह गए हैं। लाड़ प्यार के नाम पर उन्हें पैसा और आजादी दे देना उन्हें अच्छा भविष्य नहीं दे रहा है बल्कि माता पिता के लिए परेशानियों को और बढ़ा ही रहा है। अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत... ये कहावत तो बहुत कहते सुनते हैं लेकिन इस पर अमल नहीं करते। बात से रईस और रसूखदार लोगों की नहीं है, आम तौर पर हम बच्चों को क्या सिखा रहे हैं, क्या हम खुद उन्हें सिखाने के लायक हैं, क्या हम खुद ही कुछ सीख पाए हैं? या मां बाप के साथ संबंधों की गड़बड़ की एक परंपरा को ही हम आगे बढ़ा रहे हैं। इंद्राणी जो कुछ पाया वहीं अपने बच्चों को दिया लेकिन ये उसकी मजबूरी नहीं थी। वो चाहती तो जो गलतियां उसके मां बाप ने की वो उन्हें दोहराने से बच सकती था। ये भटकाव कब गंभीर मनोरोग का रूप ले लेता है कहना मुश्किल है लेकिन एक बार इस राह पर जो भटक गया उसकी स्वविवेक से वापसी तो संभव नहीं हो पाती है। माता पिता खुद को इतना योग्य और समझदार मान बैठते हैं कि किसी के सलाह मशविरे की उन्हें कोई आवश्यकता ही महसूस नहीं होती।
बच्चों को शिक्षा और संस्कार देने से पहले उन्हें खुद के भीतर पैदा करना जरूरी है। आपकी प्रतिष्ठा की भूख आपके बच्चों का कोई भला नहीं करती है उन्हें माता पिता का समय और सही मार्ग दर्शन चाहिए। वहीं आज के बदलते परिवेश में शिक्षकों को भी अभिभावकों के द्वारा दी जाने वाली शिक्षा की कमी को पूरा करना होगा। नैतिक शिक्षा जैसे विषय स्कूलों में हमेशा से पढ़ाए जाते रहे हैं लेकिन इन्हें और व्यवहारिक किए जाने की जरूरत है। अपेक्षाओं और महत्वकांक्षा की दौड़ में भटके हुए मां बाप का अपने बच्चों से सही राह पर चलने की अपेक्षा करना बेमानी है। यदि संभव हो तो माता पिता को अपनी भागदौड़ की जिंदगी से थोड़ा समय निकाल कर अच्छा अभिभावक बनने का भी कोई कोर्स करना चाहिए। यदि ऐसे कोर्स उपलब्ध नहीं हैं तो कम से कम चर्चा करके, बच्चों के मनोविज्ञान और उनकी जरूरतों को थोड़ा समझकर उनके लिए अपने समय को नियोजित करके कुछ प्रोग्राम बनाए जा सकते हैं। शीना आरूषी और ऐसे अनगिनत मामलों में माता पिता अपनी कमी का ठीकरा बच्चों पर फोड़ते हैं। पहले तो आप स्वयं को अपने बच्चों की वर्तमान स्थिति के लिए ईमानदारी से जिम्मेदार माने तभी आगे बात बढ़ पाएगी।