गुरुवार, 24 सितंबर 2009

‘चालू’ टीवी के बूढ़े ‘सीरियल्स’!

72 सालों तक अमेरिकी टेलीविजन मे छाये रहने वाले सीरियल ‘द गाइडिंग लाइट’ की आख़िरकार विदाई हुई। अमेरिका में 25 जनवरी 1937 को रेडियो पर इसकी शुरुआत हुई थी तब ये 15 मिनट का कार्यक्रम हुआ करता था। शो को काफ़ी लोकप्रियता मिली और 1952 में सीबीएस टीवी पर इसे दिखाना शुरू किया गया। आख़िरकार 2009 में दुनिया में सबसे लंबे चले टीवी सीरियल का सितंबर 2009 में अंत हुआ। गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज इस कार्यक्रम के प्रोड्यूसर्स इसको बंद करने के पीछे रिएलिटी शोज़ की बढ़ती लोकप्रियता को कारण बताते हैं। इस शो के ख़त्म होने पर भारतीय टेलीविजन के इतिहास में लंबे चले कार्यक्रमों पर ख़ास कार्यक्रम करने का मौक़ा मिला। हमारी स्पेशल टीम ने बढ़िया रिसर्च की और लंबे चलने वाले देसी शोज़ की फ़ेहरिस्त तैयार की गई। तय हुआ की जो भी शो सबसे लंबा चला होगा उससे जुड़े किसी बड़े नाम को शो में बतौर मेहमान बुलाया जाएगा। इस रिसर्च में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आये और एक बेहतरीन मेहमान से बातचीत का मौक़ा मिला जो आपके साथ बांट रहा हूं।

सबसे पहले आपके दिमाग़ में सवाल आएगा की भारतीय टेलीविजन के इतिहास में सबसे लंबा चलने वाला सीरियल कौनसा रहा है या अब भी है? कई नाम आपके दिमाग़ में आएंगे ख़ास तौर पर बालाजी टेलीफ़िल्म्स के ज़बरदस्ती खींचे गए और अपने आख़िरी दिनों में जनता की ओर से एकदम ख़ारिज कर दिए गए ‘क’ अक्षर से शुरु होने वाले सीरियल। इनमें पहला नाम ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’, दूसरा नाम ‘कहानी घर-घर की’, तीसरा नाम ‘कसौटी ज़िंदगी की’ और फिर ‘कहीं तो होगा’ आदी के साथ ये फ़ेहरिस्त बहुत लंबी जाएगी। ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ और ‘कहानी घर-घर की’ ने 8 साल तक टेलीविजन पर राज किया और जमकर माल कूटा। ये बालाजी टेलीफ़िल्म्स के सबसे लंबे सीरियल रहे। लेकिन भारतीय टेलीविजन इतिहास के सबसे लंबे सीरियल नहीं। जी हां, कोई और है जो इनसे भी बहुत आगे है!

अब आप इतिहास के झरोखे से ‘शांति’, ‘स्वाभिमान’ या और पहले जाकर ‘हम लोग’ जैसे सीरियल्स की यादें ताज़ा कर रहे होंगे लेकिन ये तो ऊपर लिखे गये सीरियल्स के मुक़ाबले कही नहीं टिकते और शायद यही वजह है कि इनकी यादें और कहानियां अब भी हमारे ज़ेहन में ताज़ा है। लेकिन ‘क’ से शुरू होकर ‘कुख्यात’ हुए बालाजी टेलीफ़िल्म्स के किसी सीरियल की खिचड़ी कहानी आपको याद नहीं होगी। ख़ैर ये बहस का अलग मुद्दा है लेकिन आपके सवाल का जवाब अब भी नहीं मिला की आख़िर सबसे लंबा चलने वाला शो कौनसा है, कहीं रामायण और महाभारत जैसे महान कार्यक्रम तो नहीं ? अरे कहां जनाब रामायण महज़ डेढ़ साल चला, हफ़्ते में एक बार आता था और इसके कुल एपिसोड थे महज़ अठहत्तर। वहीं महाभारत क़रीब दो साल चला और इसके कुल एपिसोड थे चौरानवे। न चैनलों की ये मारामारी थी, न टीआरपी का झंझट, जो कुछ थे यही कार्यक्रम थे। सड़कें ख़ाली हो जाती थी लोग पूजा की थाली और अगरबत्ती लेकर टीवी के सामने बैठ जाते थे। 1987 से 1990 तक का टेलिविजन का ये सुनहरा वक़्त मैंने भी देखा है।

चलिए अब आपको ज़्यादा परेशान नहीं करते हुए बताते है, सबसे लंबे चलने वाले देसी टीवी सीरियल का नाम। आपको जानकार हैरानी होगी की ये कार्यक्रम अब भी बदस्तूर जारी है और दर्शक इसे अब भी पसंद कर रहे हैं। 29 अप्रैल 1997 को सोनी टीवी पर शुरू हुआ ‘सीआईडी’ आज भी चल रहा है और इसने अपने 12 साल पूरे कर लिए हैं जो किसी अन्य सीरियल के मुक़ाबले कही ज़्यादा है। कार्यक्रम की विषय वस्तु और फ़ॉर्मेट कुछ ऐसा है की बालाजी के सीरियल्स की तरह ज़बरदस्ती कहानी को खींचना नहीं पड़ता, हां हर बार कुछ नया और रोमांचक दर्शकों के सामने रखने की चुनौती होती है।

क्या आज का टीवी ‘चालू’ हो गया है और ज़बरदस्ती इस पर कार्यक्रमों को खींचकर दर्शकों को बुद्धू बनाया जाता है? इस विषय पर बात करने के लिए मेरे साथ सीआईडी के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर बी. पी. सिंह ख़ुद मौजूद थे। सिंह साहब के मुताबिक टीवी को चालू टीवी कहने के बजाय इसे आज के प्रतिस्पर्धा के दौर की मजबूरी कहा जाना चाहिए। कोई कार्यक्रम जब चल पड़ता है तो उसे अचानक बंद करना या तय समय सीमा में बांधना मुमकिन नहीं होता, क्योंकि उससे चैनल की टीआरपी और सैंकड़ों लोगों का रोज़गार जुड़ा होता है। हां ये बात सही है की ये मजबूरी ज़्यादातर कार्यक्रमों की गुणवत्ता को बर्बाद करती है और आख़िरकार इन्हे बंद करना पड़ता है। यही वजह है की एक ज़माने में एक छत्र राज करने वाले सास-बहू टीवी सीरियल्स को अब कोई पूछता तक नहीं।

सिंह साहब का आगे कहना था कि साआईडी की लोकप्रियता कि बड़ी वजह हर बार एक नई कहानी को सामने रख पाने की स्वतंत्रता है, क्योंकि ये एक सस्पेंस थ्रिलर है। इन्वेस्टीगेंटिग साईंस में नित नई खोजों की वजह से भी कुछ नया कर पाने मे क़ामयाबी मिलती है। लेकिन कामयाबी की बड़ी वजह मुख्य किरादारों का पिछले 12 सालों से कार्यक्रम के साथ लगातार जुड़े रहना भी है। जबकी हमने देखा जितने भी सीरियल लंबे चले या खिंचे उनमें कभी तुलसी बदली कभी पार्वती। खींचती और उलझती कहानी के साथ ये भी कार्यक्रमों पर से दर्शकों का भरोसा उठने का एक कारण बना। ये बात सही है की जिस वक़्त सास-बहु सीरियल्स की धूम थी ऐसा लगता था अब भारतीय टेलीविजन में कुछ और नहीं चल पाएगा। सिंह साहब ने कहा कि मुझे भी सलाह दी गई की ‘क’ अक्षर का ज़माना है आप भी सीआईडी का नाम बदल कर केआईडी कर दो। लेकिन ‘क’ के टोटके का अंत हुआ जिसने ये बात साफ कर दी कि नाम से सीरियल नहीं चलते बल्कि काम से उनका ये नाम होता है।

आख़िर में मैंने बी पी सिंह साहब से ये सवाल भी किया कि अब ज़माना रिएलिटी शो का है और उसका स्तर कितना गिर चुका है ये भी सबके सामने है लेकिन क्या आपको इनसे कोई चुनौती मिल रही है। उनका जवाब था कि रिएलिटी शो को मिल रही लोकप्रियता तीन साल पहले ही अमेरिका में साबित हो गई थी और उसी की नक़ल हम अब भारत में कर रहे हैं। आप किसी भी रिएलिटी शो को उठा ले वो अमेरिकन टीवी की ही नक़ल है। रिएलिटी शो की लोकप्रियता से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन दर्शकों के साथ ज़्यादती के बाद जो हश्र सास-बहू सीरियल्स का हुआ वो इनका भी हो सकता है।

2 टिप्‍पणियां:

विकास ने कहा…

praveen ji jankari se bhaDe is lekh ke liye shukriya.......

बेनामी ने कहा…

waah kyaaaaaaaaaaa baaaaat hai sir
bahut khoob likha hai aapne shuru se aakhir tak parhne ka mann karta hi raha.....
in cheezo per dhyaan kabhi jaata nahi phir bhi apne aap me sawaal aapke is lekh ko parh kar utth rahe the,
pata nahi kyu ye story live india pe dekhi thi baavajud iske parhne me mazaa aa raha tha,
Dimaag khud aise hi sochta tha jesa aapne likha hai.
Shahnawaz khan
live india