शनिवार, 19 सितंबर 2009

संवेदनहीन दिखना एंकर की मजबूरी

कल एक ऐसी घटना हुई जो मेरे पूरे करियर में कभी नही हुई थी। हमारे प्राइम टाइम शो इंडिया प्राइम को करते वक़्त एक ख़बर के दौरान मेरी आंखों में आंसू आ गये। मैं ऑन एयर आंखों में आंसू लिए नहीं जा सकता था इसीलिए दो तीन गहरी सांसे ली और उस रुला देने वाली ख़बर के दौरान अपने कान बंद कर लिए। बाद की ख़बरे और शो के मेहमानों से बात थर्राये हुए गले से ही हुई। पीसीआर के मित्रों ने भी ब्रेक में पूछा, सर आर यू ओके, ब्रेक बढ़वाने की ज़रुरत तो नही? मैंने कहा नहीं सब ठीक है हम आगे बढ़ सकते हैं। लेकिन सब ठीक नहीं था एक मासूम बच्ची की कराहती हुई आवाज़ लगातार मेरे कानों में गूंज रही थी। राजनैतिक ख़बर हो, मनोरंजन की ख़बर हो या खेल की ख़बर वही एक पट्टियों और ज़ख़्मों से भरा ढाई साल की मासूम ज्योति का चेहरा मेरी आंखों के सामने आ रहा था जो बड़ी मासूमियत के साथ कह रही थी मेरी मां ने मुझे ट्रेन से नीचे फेंक दिया।

दरअसल एक मां ने अपनी ढाई साल की मासूम बच्ची को चलती ट्रेन से नीचे फेंक दिया ये ख़बर सुबह से हर चैनल पर चल रही थी। इस ख़बर को मैंने भी देखा था लेकिन बच्ची की बातों को सुनने का मौक़ा अपने शो मे ही मिला। जिस मासूमियत और दर्द के साथ वो बच्ची बोल रही थी उसे मेरे शब्द बयां नही कर पायेंगे। लेकिन उस बच्ची के शब्दों को हर वो शख्स समझ पाएगा जिसने ढाइ साल के बच्चे को तुतलाते हुए बोलते सुना होगा। बच्चे जो भी बोलते है बहुत अच्छा लगता है, लेकिन अगर इसी तुतलाहट के साथ टूटे फूटे शब्दों को जोड़कर कोई बच्ची ये बोले की मुझे मेरी मां ने ही चलती ट्रेन से फेंक दिया और साथ ही साथ ये भी की मुझे मां की याद आ रही है, मुझे मां के पास जाना है तो किसी का भी दिल पसीजेगा। ऑन एयर भी दिल पसीजता है लेकिन उसे बयान करना आप के काम की मर्यादाओं के ख़िलाफ है क्योंकि आप सिर्फ़ यही एक ख़बर दर्शकों को नहीं दिखा रहे हैं कई ओर ख़बरें कतार में है जिनका ‘टेस्ट’ अलग है।

मैं इसके बारे में इसीलिए लिख रहा हूं क्योंकि एक लोकप्रिय एंकर को एक बार मैंने ऑन एयर रोते हुए देखकर टिप्पणी की थी कि एंकर को संवेदनशील होना चाहिए लेकिन शो के दौरान दिखना नही चाहिए। इस घटना के बाद मुझे महसूस हुआ कि संवेदनाओं को दबाना कितना मुश्किल है और संवेदनहीन दिखना एक एंकर की कितनी बड़ी मजबूरी है। ऐसा नहीं कि भावनाएं दुखी करने वाली ख़बरों पर ही आती है, कई बार ज़बरदस्त हंसी को क़ाबू करना भी मुश्किल हो जाता है। इसका अनुभव मुझे और मेरे मित्र सुशांत को साथ में एंकरिंग करते वक़्त तब हुआ था जब प्रमोद मुथालिक को ‘पिंक चड्डियां’ विरोध स्वरूप भेंट की गई थी और इस शब्द को हमें जितनी बार बोलना पड़ा हंसी को रोकने के प्रयास उतने ज़्यादा करने पड़े। मुझे अपना ग़ुस्सा भी याद आता है जो मेरे नाम राशी डॉ प्रवीण तोगड़िया से बात करते हुए मुझे आया था और ऑन एयर मैंने उन्हें संयमित भाषा के प्रयोग और शालीनता बनाए रखने की बात तल्ख़ लहजे मे कही थी। वो घटना भी मैं कभी नहीं भूल सकता जब जनमत में मेरे कार्यक्रम जनता बोले के दौरान जनता के सवालों से घबराए बीजेपी के एक बड़े नेता ‘लैपल’ को तोड़कर मेरी तरफ़ तेज़ी से लपके थे और उसी जनता ने उनके मुंह पर उन्हे एक कमज़ोर नेता कहा था। बाद में ये प्रोग्राम ऑन एयर नही किया गया।
जीवन में ऐसे कई मौक़े आए जब ग़ुस्सा, प्रेम, दुख, ईर्ष्या आदी सभी संवेदनाएं आई लेकिन जब एक एंकर की भूमिका में होता हूं तो संवेदनहीन दिखना मेरी मजबूरी हो जाती है। ये तक़लीफ कुछ वैसी ही है जैसे आप अपने प्रिय मित्रों या परिवार के लोगों पर अपने दुख का असर नही पड़ने देना चाहते हैं और अपने भावों में अपनी संवेदनाओं को छुपाने का प्रयास करते हैं, ये प्रयास एक एंकर को मासूम ज्योति जैसी कई ख़बरों को दिखाते वक़्त करना पड़ता है। जो आंसू मेरी आंखों में थे वो कई दर्शकों की आंखों में भी रहे होंगे वो शायद उन्हें छलका भी पाए होंगे लेकिन मैं सिर्फ़ आंसू की एक बूंद ही ढलका पाया और फौरन दूसरी ख़बरों के लिए ख़ुद को तैयार किया। एंकरिंग आसान काम नहीं है दोस्तों, एंकर संवेदनहीन होता नहीं लेकिन उसे दिखना पड़ता है।

7 टिप्‍पणियां:

शिवम् मिश्रा ने कहा…

"एंकर संवेदनहीन होता नहीं लेकिन उसे दिखना पड़ता है"

अपनी मजबूरी बाखूब बताई आपने !

likho apna vichar ने कहा…

wo manzar sch mein bhut alag tha,kyon ki wo programme maine khud dekha tha

शशि "सागर" ने कहा…

aapke vichar ko doobara yahan padh raha hun...
ek anchor kee wibhinn bhumikaaon ko aapne safaltaapurvak rakha hai

रात का अंत ने कहा…

आपके विचारों से ऐसा लगा कि एक एंकर चाहकर भी संवेदनाओं को दरकिनार नहीं कर पाता...बस वो दिखता है-संवेदनहीन। जैसेकि उसका मेकअप जो चेहरे के कई दाग छुपा देते हैं।

potli ने कहा…

agree...u r 100% correct...its really tough...afterall anchors r human too n a heart throbs within them...

abhishek anand ने कहा…

बिल्कुल सही..लोग तो हमें ना जाने ही क्या समझ लेते हैं...असलियत तो ये है कि ये हमारा काम है..भावुक होकर आप किसी की मदद तो कर सकते हैं लेकिन लोगों तक सही खबर पहुंचाने के लिये ऐसा करना ही पड़ता है..

Acharya Santosh Santoshi ने कहा…

kuchh sabd shesh nahi hain ! aap ko dekhne se hi lagta hai aap ek bahu aayami pratibha ke dhani vyaki hai !! lekin vo aayam yahan tak jayega, yah sambhavtah mere liye thoda ascharychakit karta hai , kuchh hoga AVASY , kab kaise ye vakt batayega !! ishwar se aap ki lambi umr aur achhe swasth ki kamna karta hun !! jai maa santoshi