रविवार, 5 सितंबर 2010

क्या हम सचमुच ‘पीपली लाइव’ हैं?


26/11 की रिपोर्टिंग में किरकिरी करवा चुके हमारे भाई लोग अब भी ग़लतियों से सबक लेने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में नीतीश कुमार जी जैसे नेताओं को मीडिया का मज़ाक उड़ाने का मौक़ा मिल जाता है और वो हमें सचमुच का ‘पीपली लाइव’ कहने से नहीं चूकते। नक्सलवाद से निपटने की कोशिशों में झटका खाने वाले नीतीश को ऐसी गंभीर परिस्थितियों में कटाक्ष करने का और मीडिया पर टीका टिप्पणी करने का मौक़ा भी तो भाई लोग ही दे रहे हैं। पहले आतंकियों का मोहरा बन चुका भारतीय मीडिया अब नक्सलियों के इशारों पर नाच रहा है। ख़बरों के कारोबार में स्त्रोत महत्वपूर्ण होता है और बिना तस्दीक के कोई ख़बर चलाना ग़ैरज़िम्मेदाराना माना जाता है। इस कारोबार का ये बेसिक सब जानते है इसके बावजूद नक्सलियों के कथित प्रवक्ता से फोन पर बात कर-करके ख़बरे चलाने वाले चैनल्स और अख़बार क्या बेसिक्स भूल गए हैं?

नक्सलियों द्वारा बंधक बनाए गए पुलिसवालों में से एक एसआई अभय प्रसाद की हत्या की ख़बर को बिना पुष्टी हुए मीडिया ने दिन भर चलाया। हद तो तब हो गई जब दूसरे दिन अख़बारों ने बैनर हैडलाईन्स के साथ अभय प्रसाद की हत्या की ख़बर प्रमुखता से छाप दी। ये माना जाता है की ख़बरों की होड़ और जल्दबाज़ी की मजबूरी के चलते टीवी वाले ऐसी ग़लतियां ज्यादा करते हैं लेकिन अखबार वाले तो दो क़दम आगे निकले और बाक़ायदा घटना की पूरी कहानी का मनगंढ़त विस्तार भी लिख डाला। अगले दिन पता लगा की दरअसल हवलदार ल्यूकस टेटे की हत्या की गई है न कि अभय प्रसाद की।

ज़रा सोचिए क्या बीती होगी अभय प्रसाद के परिवार पर मीडिया की इन ख़बरों को देखने के बाद? खैर इससे ज्यादा महत्वपूर्ण ये है की कैसे खरबूज़ों की तरह एक दूसरे को देखकर टीवी चैनल्स ख़बरों की कब्र बनाने में लगे हुए है और अपनी विश्वशनियता का मज़ाक उन लोगों के मुंह से उड़वा रहे हैं जिनकी आलोचना वो जमकर करते हैं। इस पूरे मामले पर चुप्पी साधे बैठे बिहार के मुख्यमंत्री इन खबरों के आने के बाद फौरन मीडिया के सामने आए और लगभग जुतियाते हुए कह गए की आप सचमुच में मीडिया को ‘पीपली लाइव’ क्यों बना रहे हैं। बुरा तो लगा लेकिन राजनेता के हाथ में किसी का टेंटुआ आ जाए तो वो कैसे बच सकता है। आलोचनाओं से घिरे नीतीश कुमार को न सिर्फ अपने भाई लोगों ने घर से बाहर निकलकर मीडिया के खिलाफ हल्ला बोलने का मौक़ा दे दिया बल्कि खुद अब मुंह छुपाए बैठे हैं।

अख़बारों में ख़बरों के खंडन की या ग़लत ख़बर पर माफी मांगने की एक अच्छी परंपरा रही है लेकिन अब गलाकाट प्रतियोगिता और व्यापारवाद में वो भी दब गई। इसकी ज़ेहमत इस ख़बर पर किसी ने नहीं उठाई और टीवी वालों ने तो ऐसी किसी परंपरा का बंधन अपने लिए रखा ही नहीं है तो उनके लिए तो वैसे भी छूट है। मीडिया न सिर्फ लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है बल्कि एक मज़बूत पहरेदार भी है जो आम जनता के हितों का असली रक्षक भी है। नेता, व्यवसायी या किसी भी वर्ग के रसूख़दार लोग कोई जन-अहित कार्य करने से पहले या अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा नहीं कर पाने की सूरत में मीडिया से घबराते हैं और इसका डर उन्हे भी इन अनियमितताओं से दूर रखता है। अगर मीडिया इस तरह से अपनी विश्वसनीयता खो देगा तो इन नेताओं को सीना चौड़ा करके मीडिया की भर्त्सना करने का मौक़ा तो मिलेगा ही।

26/11 के हमले के दौरान कैसे पाकिस्तान में बैठे आंतकियों के आका टीवी चैनल्स देख-देखकर कातिल हमलावरों की मदद करते रहे ये सारी दुनिया ने देखा। एक बार फिर दहशत के कारोबार को बढ़ावा देने में नक्सली मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं। मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद आंतकी घटनाओं की रिपोर्टिंग के लिए नई गाईड लाईन्स बनाई गई थी, अब लगता है नक्सलवादी घटनाओं की रिपोर्टिंग के लिए भी नई गाईड लाईन्स बनाने की ज़रुरत है, क्योंकि हमारे मीडिया को स्वविवेक से जिम्मेदार रिपोर्टिंग करना शायद नहीं आता। इस घटना के दौरान जहां तक मेरी और मेरे चैनल की भूमिका का सवाल है हमने पुलिस विभाग द्वारा पुष्टि नहीं हो जाने तक न किसी पुलिसवाले का नाम लिया और न हीं ब्रेंकिग न्यूज़ और न्यूज़ फ़्लैश में किसी के नाम को लिखा।

2 टिप्‍पणियां:

पंकज मिश्रा ने कहा…

चलिए प्रवीण जी, इतने महीने बाद ही सही आपकी कलम तो चली। अगर मीडिया इस तरह की गलती न करता तो शायद आप यह सब लिखने पर मजबूर नहीं होते।
खैर, सबसे पहले तो आपको बधाई कि आपके चैनल ने भेड़चाल में न पड़कर, पुष्टि हो जाने के बाद ही खबर चलाई। काश कि ऐसा और भी चैनल करते।
एक बात को मैं आगे बढ़ाना चाहता हूं। आपने कहा कि २६/११ में आतंकियों ने मीडिया का इस्तेमाल किया और अब नक्सली कर रहे हैं। प्रवीण जी क्या यह नई बात है। मीडिया का इस्तेमाल को कब से हो रहा है और मजे की बात यह है कि मीडिया यह जानता भी है कि उसका इस्तेमाल हो रहा है फिर भी यह सब हो रहा है। क्या नेता, अभिनेता और खिलाड़ी मीडिया का इस्तेमाल नहीं करते। समय आने पर करते हैं और फिर दूध की मक्खी की तरह निकालकर फेंक भी देते हैं। मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि इस दिशा में कुछ सार्थक पहल करने की जरूरत है। जो भी मीडिया का अपमान करे उसका इस्तेमाल करे उसका बहिष्कार किया जाना चाहिए। यह तभी संभव है जबकि मीडिया में एकजुटता आएगी।
आपके विचारों की प्रतिक्षा में...

pratham ने कहा…

Such likha aapne jaha tak mai samjhta hu ye sab beshram khawb aur beadab khwahisho ka natija hai sir