सोमवार, 1 नवंबर 2010

बॉस को रिझाना, तरक्की का फॉर्मूला ?


तरक्की की यूं तो कोई परिभाषा नहीं और ना ही इसके लिए कोई सेट फॉर्मूला है। हां तरक्की पाने के लोगों के अपने-अपने तरीक़े ज़रुर होते हैं और कुछ ऐसे तरीक़े भी होते हैं जो तरक्कीप्रिय लोगों में प्रचलित भी होते हैं। इनमें सबसे आम तरीक़ा है बॉस को ख़ुश रखना जो कारगर तरीक़ा भी है। ये ज़रुर है कि बॉस को खुश करने के और बॉस के ख़ुश होने के तरीक़े अलग-अलग होते हैं। कुछ बॉस अच्छा काम देखकर, कर्मचारी की क्षमता और प्रदर्शन देखकर खुश होते हैं तो कुछ बॉस विश्वासपात्र और अंदर की ख़बर या पल-पल का अपडेट पहुंचाने वाले कर्मचारियों से खुश होते हैं। वहीं कुछ ऐसे भी होते हैं जिनकी दिलचस्पी कर्मचारियों के काम-काज से ज्यादा कर्मचारियों की ‘काम’ प्रवृत्ति में होती है खास तौर पर महिला कर्मचारियों की, और कुछ इन सबका मिलाजुला रूप होते है।

बात सिर्फ बॉसेस की ही नहीं बल्कि कर्मचारियों की भी यहीं क़िस्में होती है और यहां उनका प्रयास बॉस की प्रवृत्ति के अनुरूप अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल करना होता है। ये टिप्पणी सभी बॉसेस और कर्मचारियों पर नहीं की जा सकती लेकिन ये ज़रूर सच की इनमें से कोई एक प्रवृत्ति तो बॉस और कर्मचारियों में होती ही है और जहां दोनों के बीच सामंजस्य हो जाता है वहां से तरक्की शुरू होती है। इस विषय का न तो मैं विशेषज्ञ हूं और न ये मेरी रूचि का विषय है लेकिन इस विषय पर हाल ही में किये गए एक शो में दर्शकों ने बहुत दिलचस्पी दिखाई।

विषय था क्या तरक्की के लिए बॉस को रिझाना ज़रूरी है? बदलते वक्त के साथ-साथ महिलाओं ने भी तरक्की की है और कई महिला बॉसेस भी अब प्रतिष्ठित संस्थानों में आसीन है। लेकिन इनकी तादाद अब भी बहुत सीमित है और ऐसे में चर्चा का फोकस पुरूष बॉस और उनकी महिला कर्मचारी ही था। विशेषज्ञ के तौर पर एक समाजशास्त्री, एक मनोचिकित्सक और ऐड गुरू के नाम से मशहूर प्रहलाद कक्कड़ मौजूद थे। समाजशास्त्री महोदय ने बदलते परिवेश और बढ़ते कॉम्पीटिशन में आगे निकलने की जद्दोजहद को इसकी वजह बताते हुए इस पर टिप्पणी की तो मनोचिकित्सक महोदय ने इसे मानव का सहज गुण बताते हुए कहा की सेक्सुएलिटी स्त्री का एक मज़बूत और असरदार हथियार हमेशा से रहा है। बड़े-बड़े युद्धों, राजनैतिक लड़ाइयों और सत्ता के उलटफेर की गाथाओं में इस हथियार के इस्तेमाल के कई उदाहरण आसानी से मिल जाएँगें। ऐसे में आज की गलाकाट प्रतियोगिता में इसका इस्तेमाल अगर हो तो कोई आश्चर्य नहीं।

लेकिन इस विषय पर सबसे महत्वपूर्ण पहलू पर रौशनी डाली ऐड गुरू महोदय ने जो खुद ग्लैमर इंडस्ट्री का बड़ा नाम हैं। ग्लैमर इंडस्ट्री इस मामले में सबसे ज्यादा बदनाम है और यहीं से कास्टिंग काउच जैसी टर्म चर्चाओं में आई। मीडिया इंडस्ट्री भी अब ग्लैमर का ही हिस्सा मानी जाती है सो इस पर बातचीत में कक्कड़ साहब की टिप्पणियां महत्वपूर्ण थी क्यों वो सिर्फ ग्लैमर इंडस्ट्री का हिस्सा ही नहीं है बल्कि खुद एक प्रतिष्ठित संस्थान के बॉस हैं। प्रहलाद कक्कड़ ने पहली टिप्पणी की महिलाओं की तरक्की पर और जिससे मैं भी सहमत हूं, उनके मुताबिक कोई महिला जब भी तरक्की करती है तो उसके साथियों के ज़ेहन में पहली चीज़ यही आती है की इसने अपने बॉस को रिझाया होगा। यहां तक कि साथी महिलाओं की भी इसी तरह की प्रतिक्रिया होती है और उस तरक्की करने वाली महिला की प्रतिभा और कर्मठता धरी की धरी रह जाती है। हांलाकि कक्कड़ ने इस बात से भी इन्कार नहीं किया की प्रतिभाहीन और अकर्मण्य महिलाएं भी तरक्की करती है और इसका श्रेय उनकी इसी छुपी हुई प्रतिभा को जाता है जिसका सीधे तौर पर उनके असल काम से कोई लेना देना नहीं होता।

कुल मिला कर चर्चा का सार ये निकला की न तो ये कला, विधा या हथकंडा जो भी आप कहें नया है और न ही ये किसी एक कार्यक्षेत्र जैसे मीडिया या ग्लैमर इंडस्ट्री तक सीमित है। हमेशा से इसका इस्तेमाल सफलतापूर्वक होता रहा है और आगे भी होता रहेगा लेकिन यहां हमाम में सब नंगे हैं की कहावत सही नहीं बैठेगी, क्योंकि न तो सारे बॉसेस इस प्रवृत्ति के होते है और न ही सारे कर्मचारी प्रतिभाहीन।

2 टिप्‍पणियां:

Parul ने कहा…

aajkal har kisi ko kamyaabi ki itni jaldi hai ki har koi shortcut chahta hai..chahe formula sahi ho ya galat..!

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

प्रवीणजी आपकी बातों से पूरी तरह असहमत तो नहीं हूँ..... पर यह भी जोड़ना चाहूंगी की
जो महिलाएं काबिल हैं और खुद को साबित करने की योग्यता रखती हैं वे भी इस खेल का शिकार होती हैं....क्योंकि आमतौर पर वे ऐसे रास्ते नहीं अपनातीं.....