शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

चीन जैसा तामझाम या भारत जैसी आज़ादी?

चीन में साम्यवाद के 60 वर्ष पूरे होने के अवसर पर बेहतरीन आतिशबाज़ी और ज़बरदस्त सामरिक शक्ति का प्रदर्शन ये साफ़ करता है की चीन दुनिया को ये बताना चाहता है कि उस जैसा कोई नहीं। ओलंपिक के दौरान बहुत सी तैयारियां की ही गई थी, कलाकारों की बेहतरीन ट्रैनिंग भी थी और इन्ही तमाम तैयारियों और बची हुई आतिशबाज़ियों का मुज़ाहिरा दुनिया ने दांतों तले उंगली दबाकर देखा भी। चीन ने ओलंपिक के आग़ाज़ से अंजाम तक शानदार पैकेजिंग की और पूरी दुनिया में उसकी वाहवाही भी हुई। चीन बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था दोबारा इन्ही तारीफ़ों को सुनने का और ये मौक़ा भी उसे जल्दी ही मिल गया जब 60वीं वर्षगांठ पर उसने दोबारा सैन्य शक्ति के साथ-साथ इन आतिशबाज़ियों और कलाकारों का इस्तेमाल किया। ज़ाहिर सी बात है ओलंपिक के दौरान ही ये योजना बना ली गई होगी की इस भव्यता और शक्ति प्रदर्शन को दुनिया के सामने एक बार फिर इस ख़ास मौक़े पर रखा जाएगा।

दुनिया में कौन अपनी वाह वाही नही करवाना चाहता, सो चीन ने भी यही किया। दुनिया में कौन ख़ुद को सबसे ज़्यादा ताक़तवर नहीं दिखाना चाहता, यही चीन ने भी दिखाया। लेकिन अहम बात ये है कि क्या दुनिया को इस प्रदर्शन से वाक़ई प्रभावित होना चाहिए? जनाब दुनिया की छोड़ते है क्या हम हिन्दुस्तानियों को ये सोचकर हीनता महसूस करनी चाहिए की हम इस तरह की शक्ति का मुज़ाहिरा नहीं कर पाते है और ये सब हमारा वहीं पड़ोसी कर रहा है जो कभी भारत की सीमा में घुसकर लाल रंग से चीन लिख जाता है, आतंकवाद फैलाने वाले हमारे सबसे बड़े दुश्मन के दोस्त के तौर पर जाना जाता है और इस दहशत गर्दी में उसकी मदद भी करता है, कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानते हुए उसके लिए नई वीज़ा पॉलिसी बनाता है। जी नहीं बिल्कुल भी हीन महसूस करने की ज़रुरत नहीं है क्योंकि ख़ुद को ताक़तवर दिखाने का मतलब, ताक़तवर हो जाना नहीं होता। इसमें कोई दो राय नहीं की बीते वक़्त में चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था के साथ-साथ सामरिक शक्ति को भी बढ़ाया है लेकिन ये भी ग़ौर करने वाली बात है कि भारत समेत अन्य विकासशील देश भी तेज़ी से ख़ुद को मज़बूत कर रहे हैं। लेकिन कोई भी इस तरह की पैकेजिंग के साथ ख़ुद को परोसने की कोशिश नहीं करता जैसी चीन ने की।

ख़ुशियां मनाने में कोई हर्ज़ नहीं है लेकिन जब जश्न का मक़सद भी ताक़त दिखाना हो जाता है तो जश्न, जश्न नहीं रह जाता कोरा प्रदर्शन रह जाता है। चीन दुनिया में अपनी टेक्नोलॉजी और श्रम के साथ-साथ अपनी धोख़ेबाज़ी के लिए भी जाना जाता है। चाहे वो भारत की पी़ठ में हिन्दी चीनी भाई-भाई कहकर छुरा भोंकना हो या अब भी नापाक इरादों वाले पाक को सामरिक मदद के साथ-साथ भारत के साथ कूटनीतिक बातचीत को जारी रखना हो। बहुत मुमकिन है कि इस प्रदर्शन के दौरान भी उसकी कोशिश ताक़त को बढ़ा चढ़ा कर पेश करने की ही रही होगी। कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर वो मिसाईलों की जगह सिर्फ खोखले डिब्बों को तादाद बढ़ाने के लिए रख दे। ख़ैर ये बात मैं सिर्फ़ इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि भारतीय वायुसेनाध्यक्ष के मुताबिक अब हालात 62 वाले नहीं है कि हिन्दुस्तान कमज़ोर पड़ जाए या ऐसे खोखले प्रदर्शनों से घबरा जाए।

ख़ूबसूरती, कलाकारों की मेहनत और अनुशासन की मुक्तकंठ से प्रशंसा की जानी चाहिए और हम करते भी है लेकिन इन सब चीज़ों का इस्तेमाल जब धौंस देने के लिए हो तो प्रशंसा नहीं भर्तस्ना होनी चाहिए। चीन में कोई सेलीब्रेशन नहीं चल रहा था बल्कि ताक़त का मुज़ाहिरा हो रहा था। एक ऐसा मुज़ाहिरा जिससे चीन के आम आदमी का भी कोई लेना देना नहीं था। संगीनों के साए में एक जश्न मनाया जा रहा था जिसमें चीन के आम आदमी को घर से बाहर निकलने तक की इजाज़त नहीं थी। मुझे नज़ारा बहुत ख़ूबसूरत लग रहा था लेकिन हमारी परेड भी याद आ रही थी जो दुनिया को दिखाने के लिए आम हिन्दुस्तानी को दिखाने के लिए होती है और इस आम हिन्दुस्तानी के लिए बैठने का ख़ास इंतज़ाम भी किया जाता है। ऐसे में ये कहना ग़लत नहीं होगा चीन की ताक़त से हिन्दुस्तान की आज़ादी लाख गुना बेहतर है।

4 टिप्‍पणियां:

Suman ने कहा…

ख़ूबसूरती, कलाकारों की मेहनत और अनुशासन की मुक्तकंठ से प्रशंसा की जानी चाहिए?nice

sudhir kumar ने कहा…

चीन ने जो कुछ किया वो शक्ति प्रदर्शन से ज्यादा कुछ भी नहीं था इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता...पर ये बात भी सही है की शक्ति प्रदर्शन में शक्ति तो थी ही...वो भी अपार...सवाल उठता है की हम चीन की आलोचना क्यो कर रहे हैं..साल में 2 बार हम जिस शक्ति का प्रदर्शन करते है चीन ने भी उसी का एक रुप दुनिया को दिखाया...फिर दिक्कत क्या है...चीन के 60 साल हमारे 62 साल पर भारी क्यो पड़ रहे हैं...इसपर विचार किया जाना चाहिए और फिर व्यापाक नीति बनाकर अमल भी होना चाहिए...चीन हमारा पड़ोसी है और रहेगा...बेहतर होगा हम उसकी खामियों को अपनी ताकत न बनाकर अपनी ताकत को बढ़ाएं...हम चीन से पीछे जरुर हैं पर पिक्चर अभी बाकी है ...रेस को जीतने के लिए प्रयास जारी रखना चाहिए ...जीत हमारी ही होगी

MANISH ने कहा…

प्रवीन जी , आपने अपने लेख में जहाँ चीन की सामरिक ताकत की व्याख्या की हैं वहीं आपने चीन का एक दूसरा रुप भी सामने रखा है ...आपने मौलिक आजादी और अधिकारों की बात की है...मुझे लगता है कि चीन भले ही कितना ताकतवर क्यों न हो ..लेकिन भारत जैसे लोकताँत्रिक देश की तरह न तो वहाँ अभिव्यकित की आजादी है औऱ न ही इन्सानी मूल्यों की कद्र...मैं कुछ दिनों पहले एक नेवी के वरिष्ठ अधिकारी से मिला था औऱ वो कई बार चीन का यात्रा कर चुके हैं....उनका कहना था कि वो चीन को काफी करीब से जानते हैं...और उनके हिसाब से चीन में तानाशाही बहुत है...उन्होनें मुझे एक उदाहरण दिया जो बहुत हैरतगेंज कर देने वाला था....उनका कहना है कि चीन का कोई भी छात्र अपनी मर्जी से मनचाहा सब्जेक्ट नहीं ले सकता किसको क्या पढ़ना है वो भी चीन की सरकार तय करती है...इसका मतलब आप भले ही अपने मन में डाँ या सांइटिस्ट बनने का सपना सजोंये हों लेकिन वही होगा जो चीन की सरकार चाहेगी....मुझे सच में ये नहीं पता कि ये कितना सच है लेकिन अगर इस बात में जरा भी सच्चाई है तो ये बेहद खौफनाक और बदसूरत है...कम से कम मेरा तो यही मानना है...
मनीष शुक्ला

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत बढ़िया विचारणीय आलेख . आभार .