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सोमवार, 31 अगस्त 2009

'टाइम्स नाऊ' के ब्रांड एंबेसडर मोहन भागवत!

संघ की प्रेस कॉंन्फ्रेंस के दौरान जिस तरह संघ प्रमुख मोहन भागवत बार बार 'टाईम्स नाऊ' का नाम ले रहे थे ऐसा लग रहा था कि वो चैनल के ब्रैंड ऐम्बेसेडर है। इस पत्रकार वार्ता पर पूरे देश की नज़र थी की क्या संघ प्रमुख बीजेपी के संकट पर यहां कुछ कहेंगे। यही वजह थी की यहां चाहे प्रिंट हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सभी बड़े पत्रकार भी मौजूद थे। अपनी बात को संक्षेप में रखकर संघ प्रमुख ने पत्रकारों के सवाल आमंत्रित किये, यानि यहां वो जानते थे कि इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में बीजेपी का मुद्दा ही छाया रहने वाला है। लेकिन इन सवालों की जो काट सरसंघचालक ने सोची थी उसका अंदाज़ा शायद इन पत्रकारों को भी नहीं था। बीजेपी की स्थिति पर पूछे गए लगभग हर सवाल के लिए उनके पास एक ही जवाब था। मुझे जो कुछ कहना है मैंने ‘टाइम्स नाउ’ पर कह दिया है।
पहला सवाल स्टार के दीपक चौरसिया जी ने पूछा जिसमें उन्होंने बीजेपी पर उनके ताज़ा बयान के बाद किसी परिवर्तन के मद्देनज़र अपना सवाल रखा। जवाब आया मुझे जो कहना था मैं ‘टाइम्स नाउ’ पर कह चुका हूं। अगला सवाल एनडीटीवी के दिबांग जी ने पूछा। सवाल में वो बहुत कुछ जानना चाहते थे, लेकिन जवाब आया? ठीक समझे आप! मुझे जो कहना है मैं ‘टाइम्स नाऊ’ पर कह चुका हूं। अब स्थिति ये हो गई की जैसे ही वो चैनल का नाम लेते, पत्रकारों से खचाखच भरे संघ दफ़्तर में ठहाके गूंज उठते। लेकिन साथ ही साथ पत्रकारों को ये बात चुभ भी रही थी क्योंकि यहां और भी चैनल थे और एक सामूहिक पत्रकार वार्ता में बार-बार चैनल विशेष का नाम लेना ठीक भी नहीं लग रहा था। आख़िरकार एक पत्रकार ने अपने सवाल के बाद ये भी जोड़ा की आप बार-बार ‘टाइम्स नाऊ’ का ज़िक्र कर रहे है, क्या आप अपनी राष्ट्र भाषा हिन्दी के दर्शकों तक अपनी बात नहीं पहुंचायेंगे, हिन्दी से आप परहेज़ क्यों कर रहे हैं? इस पर मोहन भागवत जी का गोलमोल जवाब आया और उन्होंने कहा कि हिन्दी चैनल पर इंटरव्यू का संयोग नहीं बन पाया, ये काम हमारा प्रचार विभाग देखता है।
एक बात सभी को अजीब लग रही थी कि जो बात दो दिन पहले भागवत साहब ने एक निजी चैनल को दिए इंटरव्यू में कही है और वो उन बातों पर अब भी बरक़रार हैं, तो फिर क्यों नही उसे एक बार हिन्दी दर्शकों के लिए कह रहे हैं। इस पर एक पत्रकार ने भागवत साहब को ये भी कहा कि आप बार-बार ‘टाइम्स नाऊ’ का नाम ले रहे, लेकिन हम उनसे फीड शेयर नहीं कर सकते, कॉपी राइट का मामला है। फिर एक ठहाका गूंजा और बात आई-गई हो गयी। तक़रीबन सवा घंटे चली इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में कई सवालों के जवाब भागवत साहब ने यही कहते हुए दिए कि उन्हे जो कुछ कहना है वो ‘टाइम्स नाऊ’ पर कह चुके हैं। इस बात को जितनी बार मैंने यहां लिखा है, उससे कहीं ज्यादा बार उन्होंने पत्रकारों के साथ इस बातचीत में दोहराया। अब सवाल ये उठता है कि बाक़ायदा नाम पर जोर दे-देकर इस बात को कई बार कहना कहीं इसका प्रचार करने के लिए तो नहीं? या इस संस्थान से संबंध मज़बूत करने के लिए तो नहीं?
इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मुझे कई चेहरे याद आ रहे थे जो अलग-अलग चैनलों पर दूसरे चैनलों का गुणगान करते नज़र आते हैं। आप अगर ये सोच रहे हैं कि ये स्वाभाविक तौर पर हो जाता है तो आप ग़लत हैं क्योंकि ऐसी ‘ग़लती’ उनसे उन चैनलों पर नहीं होती जिनका वे गुणगान करते हैं या जिनके वो ‘ब्रैंड ऐंबेसेडर’ होते हैं। अगर अभी तक आपने ग़ौर नहीं किया तो अब कीजिएगा। मैंने ख़ुद ऐसे कई ब्रैंड एंबेसेडर्स को झेला है। एक मामला आपके ज़ेहन में ताज़ा होगा जब बीजेपी के वरिष्ठ नेता रविशंकर प्रसाद ने डॉ प्रणय रॉय को उनके शो पर दो बार अर्नब गोस्वामी कहकर कर बुलाया जिस पर डॉ साहब को अपने सधे हुए अंदाज़ में आपत्ति दर्ज करवानी पड़ी थी। उन्होंने कहा था अर्नब हमारे संस्थान से जुड़े रहे हैं, वो हमारे ही परिवार के सदस्य हैं लेकिन मेरा नाम अर्नब गोस्वामी नहीं, प्रणय रॉय है। मीडिया जगत की इतनी बड़ी हस्ती के साथ जो हुआ, क्या ये सब ग़लती से होता है या जानबूझकर?
you can watch the video of ravishankar prasad's mistake with dr. prannoy roy by clicking.....
http://www.youtube.com/watch?v=1tJqJIUUsrM&feature=channel