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गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

सांईं बाबा के फिल्मी अवतार - मालिक एक


सांईं के प्रति प्रोड्यूसर्स की निजी आस्था या बाबा के अनगिनत भक्त, जो बाबा के जीवन चरित्र को बारंबार देखना चाहते हैं, चाहे जो वजह हो लेकिन थोड़े-थोड़े अंतराल पर बाबा पर कोई न कोई फिल्म या सीरियल बनता ही रहता है। इनके साथ बाबा के नए नए फिल्मी अवतार भी सामने आते रहते हैं। अच्छी बात ये है की बाबा दूसरे पूजनीय भगवानों की तरह आदि-अनंत काल के न होकर हमारे युग में रहे हैं सो उनकी तस्वीरें, उनके आचार विचार और उनके भक्तों की ज़ुबानी उनका अंदाज़ सही-सही हमारे पास मौजूद है। ब्रह्मा-विष्णु-महेश या अन्य भगवान कैसे दिखते थे? कैसे थे? ये सवाल तो कभी नहीं सुलझ पाएँगे लेकिन इनकी आकृति प्रकृति भी पहले चित्रकारों और फिर फिल्मकारों के माध्यम से हम तक पहुंचती रही है।

जब किरदार को लोगों ने देखा हो तो उसे हूबहू पेश करना और उसके अंदाज़ को परदे पर दिखाना बड़ी चुनौती बन जाता है। सांईं के किरदार के साथ भी कुछ ऐसा ही है। परदे वाले साँईं की बात करते ही सामने सुधीर दलवी साहब का चेहरा आ जाता है। 1977 में अपनी उम्र से कहीं बड़ा किरदार करते हुए दलवी ने बाबा का परदे पर पहला अवतार दिखाया था। मनोज कुमार, राजेन्द्र कुमार, शत्रुघ्न सिन्हा और हेमा मालिनी जैसे उस ज़माने के दिग्गज सितारों ने इस फिल्म में काम किया था लेकिन दर्शकों को अगर कोई याद है तो वो है बाबा का फिल्मी अवतार। ऐसा नहीं है कि इसके बाद बाबा के जीवन पर कोई फिल्म बनाने की कोशिश नहीं की गई लेकिन first impression is the last impression वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए सिर्फ 1977 का ये फिल्मी अवतार ही दर्शकों पर हावी रहा है। छोटे परदे पर भी मुकुल नाग ने बाबा के तौर पर लंबी पारी खेली और दर्शकों ने उन्हें पसंद भी किया लेकिन बाबा वाला चेहरा अब भी सुधीर दलवी का ही रहा।

‘मालिक एक’ में एक बार फिर बाबा का नया फिल्मी अवतार दर्शकों के सामने है और इस बार निर्देशक दीपक बलराज ने पुरानी इमेज को तोड़ने के लिए न सिर्फ बाबा के अंदाज़ और लुक पर ज़्यादा मेहनत की है बल्कि स्टार वेल्यू का भी सहारा लिया है। ये पहला मौक़ा है जब फिल्मी पर्दे पर साँईं की भूमिका में कोई स्थापित कलाकार देखने को मिलेगा। इस फिल्म में सांईँ का अवतार ले रहे हैं, तक़रीबन 170 फिल्मों में काम कर चुके और अपने ज़माने में जबरदस्त फैन फॉलोईंग रखने वाले जैकी श्रॉफ। पहली बार किसी किरदार को करना उतना मुश्किल नहीं होता क्योंकि दर्शकों के मन पर कोई छवि अंकित नहीं होती सिवाय असल तस्वीरों के लेकिन जब किरदार को पर्दे पर दोबारा उतारना होता है तो चुनौती दोगुनी हो जाती है। पहली उस किरदार को निभाने की और दूसरी उस किरदार को पहले निभा चुके कलाकारों की छवि को तोड़कर एक नई पहचान दर्शकों के दिल में बनाने की, और जैकी इस चुनौती से वाकिफ हैं। हालांकि वो खुद मानते हैं की सुधीर दलवी की जो इमेज दर्शकों के मन में है उसे तोड़ना मुश्किल है और वो ऐसा चाहते भी नही, लेकिन हां वो इस फिल्म को दर्शकों के लिए एक फ्रेश फिल्म की तरह जरूर रखना चाहते हैं।

जहां तक तैयारी का सवाल है जैकी का कहना है इस फिल्म के लिए उन्होंने कोई तैयारी नहीं की बल्कि उन्हे खुद ब खुद बाबा से जो प्रेरणा मिलती गई उससे वो किरदार को आगे बढ़ाते रहे। कुछ जगहों पर जैकी ने बहुत शानदार तरीक़े से बाबा के अंदाज़ को आम लोगों की तरह दिखाने की कोशिश की है ख़ास तौर पर एक बुजुर्ग के तौर पर अपनी उम्र से कहीं बड़ा किरदार जैकी ने निभाया है और फिल्म के प्रोमोज़ देखकर ये शानदार भी दिख रहा है। जैकी को इस किरदार के लिए मनाने में बलराज को 6 महीने का समय लगा था क्योंकि इस तरह के लाइफ टाइम किरदार कई बार हमेशा हमेशा के लिए आपकी इमेज से जुड़ जाते हैं मसलन सुधीर दलवी ने 1977 में ये किरदार किया था लेकिन इसके बाद भी आज तक उनकी पहचान यही फिल्म है या उनका जिक्र जब भी आता है तो सांईं के फिल्मी अवतार के तौर पर ही आता है। ऐसा नहीं की उन्होंने कोई और फिल्म नहीं की या सीरियल्स नहीं किये पर ये एक किरदार उनके हर किरदार पर भारी रहा। कुछ यही कहानी रामायण और महाभारत जैसे मशहूर सीरियल्स में काम करने वाले लगभग सभी कलाकारों की है। जैकी इस बात को जानते हैं लेकिन अब उन्हे इस बात से भी कोई परहेज़ नहीं की दुनिया उन्हे साँई के फिल्मी अवतार के तौर पर ही जाने। उनका कहना है कि इस फिल्म को करते हुए उनकी निजी ज़िदंगी और आदतों में बहुत बदलाव आया है और उन्हे लगता है की अब वो बाबा की सीख को और बेहतर समझने लगे हैं। अगर दुनिया उन्हें इसी किरदार के तौर पर भी जानेगी तो भी वो धन्य हैं।