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शनिवार, 29 अगस्त 2009

जब पत्रकार नेता बन जाता है !

मीडिया लोकतंत्र का मज़बूत स्तंभ है और हमेशा से राजनीति हो या नौकरशाही, खेल हो या मनोरंजन हर क्षेत्र में इसकी अहम भूमिका रही है। विशेषज्ञों का पत्रकारिता में आना हमेशा से एक परंपरा रही है और ये विशेष विषयों की पत्रकारिता के लिए अच्छा भी रहा है। फिर चाहे इन विषयों में राजनीति ही क्यों न रही हो। महात्मा गांधी की पत्रकारिता भी इसी तरह की थी, वो मीडिया की ताक़त जानते थे और इसका असर भी। ऐसे कई नेताओं के उदाहरण हैं जिन्होंने सफल पत्रकारिता भी की। लेकिन बदलते वक़्त के साथ ये परंपरा भी बदली है। अब बात परंपरा में आए बदलाव, पहले राजनीतिज्ञ पत्रकारिता करते थे अब पत्रकार राजनीति करते हैं। वैसे नेता बनने के बावजूद पत्रकार की राजनीति विचार और लेखों की राजनीति ही रहती है। ऐसे कई उदाहरण हैं जो पत्रकारों की राजनैतिक महत्वाकांक्षा पूरी होने की कहानी बयां करते हैं। लेकिन यहां मैं सबसे ताज़ा मामले पर आपकी तवज्जों चाहूंगा। आदरणीय अरुण शौरी कितने बेहतरीन पत्रकार रहे हैं ये किसी से छिपा नहीं लेकिन वो राजनीति में पत्रकारिता के इस्तेमाल का भी बेहतरीन उदाहरण हैं। जो बात बीजेपी की चिंतन बैठक में नहीं कही, जो बात अपने सहयोगियों के साथ कई मुलाक़ातों में नहीं कही वो एक अख़बार में लिख डाली। मक़सद क्या था शौरी साहब का? मक़सद था इसका असर और अपनी ताक़त बताना। राज्यसभा के चुनाव नज़दीक हैं और अगर आपको फिर से राज्यसभा में बैठना है तो अपनी अहमियत तो बतानी ही होगी। वैसे जो शिकायतें शौरी साहब ने दर्ज करवाई उनमें एक पार्टी परंपरा के ख़िलाफ़ जाकर अरुण जेटली को तीसरी बार राज्यसभा में ऐंट्री देना भी है। यहां उनका मक़सद पार्टी को परंपरा याद दिलाना तो क़तई नहीं था बल्कि ये बताना था कि हार के ज़िम्मेदार को तीसरी बार मौक़ा और हमसे दूसरी बार में ही आनाकानी हो रही है। शौरी साहब के अंदर सोया हुआ पत्रकार जागा, उन्होंने एक सम्मानित अख़बार में अपनी भड़ास निकाली, एक प्रतिष्टित चैनल में एक अन्य बड़े पत्रकार को एक्सक्लूसिव इंटरव्यू दिया। मीडिया में उथल-पुथल मच गई, और पार्टी के उन नेताओं को जो शौरी साहब के राज्यसभा में जाने को लेकर गंभीर नहीं थे उनकी ताक़त का अहसास हुआ। एक पत्रकार की ताक़त देखकर अच्छा लगता है, लेकिन पत्रकारिता का राजनीति के लिए इस्तेमाल देखकर बुरा लगता है। अपने निजी हितों को साधने के लिए एक बड़े पत्रकार ने मीडिया का इस्तेमाल किया और ऐसा सिर्फ़ उन्होंने नहीं किया तमाम नेता करते है। इसके लिए नेताओं और राजनैतिक दलों के अलग-अलग मीडिया हॉउसेस से संबंधों के क़िस्से जगज़ाहिर हैं। लेकिन एक पत्रकार जो अब नेता बन गया वो अपने बीते प्रोफ़शन का इस्तेमाल दोबारा नेतागीरी चमकाने के लिए करे, ये नैतिकता के ख़िलाफ़ लगता है। ये पत्रकार cum नेता कई अन्य पत्रकारों के प्रेरणा स्तोत्र हैं और इन्ही के नक्शे क़दम पर चलते हुए, इन नए पत्रकारों ने भी अपनी ’कैंपेनिंग’ शुरू कर दी है। ज़ाहिर है पत्रकारिता पर इसके दुष्प्रभाव होंगे या हो रहे जो हम सबके सामने हैं। या तो पत्रकारिता करें या राजनीति, अपने हितों के लिए राजनीति की पत्रकारिता करना इसके मूल्यों को गिराना है। डॉ प्रवीण तिवारीएंकर/प्रोड़यूसर, लाइव इंडिया